नई दिल्लीः हाल ही में एम्स के रेजीडेंट डॉक्टर्स की टीम ने मरीजों के परिवार वालों से अपनी सुरक्षा के लिए एम्स के एडमिनिस्ट्रेशन से सेल्फ डिफेंस और फिटनेस ट्रेनिंग की रिक्वेस्ट की थी. एडमिनिस्ट्रेशन द्वारा इस मांग को स्वीकार भी कर लिया गया था. लेकिन अब लगता है कि इस पर रोक लग सकती है. जानिए, क्या हुआ.
क्या कहना है हाई कोर्ट का- डॉक्टर्स के खिलाफ मरीजों और उनके परिवार वालों के बढ़ते हमलों को हाई कोर्ट ने संज्ञान में लेते हुए कहा है कि हिंसा किसी भी तरह से नहीं होनी चाहिए फिर वो मरीज की तरफ से हो या फिर डॉक्टर्स की तरफ से. हाई कोर्ट ने इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (आईएमए) को पार्टी बनाते हुए सेंट्रल गर्वन्मेंट और स्टेट गर्वन्मेंट से लगातार बढ़ रही हिंसाओं के लिए जवाब मांगा है. हाई कोर्ट का कहना है कि आखिर ऐसी नौबत क्यों आ गई कि डॉक्टर्स को अपनी जान बचाने के लिए सेल्फ डिफेंस ट्रेनिंग लेनी पड़ रही है.
इतना ही नहीं, हाई कोर्ट ने हिंसा के कारणों को जानने के लिए डॉक्टर्स की सुरक्षा के लिए क्या प्रावधान है और क्या कुछ किया जा रहा है इस पर भी जवाब मांगा है. इन सभी के साथ 19 मई तक कोर्ट को ये भी रिपोर्ट देनी होगी कि गर्वन्मेंट हॉस्पिटल्स में कितने बैड, कौन सी सुविधा और क्या-क्या इक्यूपमेंट्स हैं. इसके अलावा ये भी बताना है कि कितना मेडिकल स्टाफ है, कितनी नर्स है और कितने डॉक्टर्स हैं. ये भी बताना होगा कि हॉस्पिटल जब बना था तब कितना स्टाफ था और हॉस्पिटल आज की रिक्वायन्मेंट पूरी कर पा रहा है या नहीं. ताकि जरूरत के हिसाब से उन्हें अपडेट किया जा सके.
इस मामले में क्या कहना है आईएमए के अध्यक्ष का- इस मामले में आईएमए के अध्यक्ष डॉ. के.के.अग्रवाल ने एबीपी न्यूज़ की संवाददाता रत्ना शुक्ला को बताया कि इंडियन मेडिकल एसोसिएशन इस ट्रेनिंग के सख्त खिलाफ है. वे इसलिए इस तरह की ट्रेनिंग का समर्थन नहीं करते क्योंकि इससे डॉक्टर्स के दिमाग में अलग तरह की सोच डवलप होगी. इसका मतलब डॉक्टर्स मरीज को एक मरीज की तरह नहीं बल्कि पोटेंशियल किलर के तौर पर ट्रीट कर रहे हैं. डॉक्टर्स मानने लगेंगे कि मरीज और उनके अटेंडेंड से उनकी जान को खतरा है या वे उनके विरोधी है. ऐसे में सोसाइटी में गलत मैसेज जाएगा.
ऐसे में माना जा रहा है कि डॉक्टर्स की सेल्फ डिफेंस और फिटनेस ट्रेनिंग जो कि 15 मई से शुरू होनी थी, खारिज हो सकती है.