अगर आप पहले प्रेग्नेंट हो चुकी हैं, लेकिन अब दोबारा प्रेग्नेंट होना मुश्किल हो रहा है, तो हो सकता है कि आप सेकेंड्री इनफर्टिलिटी फेस कर रही हों. ये ज्यादातर लोगों की सोच से कहीं ज्यादा कॉमन है. विशेषज्ञों की मानें, तो सभी इनफर्टिलिटी केसेस में लगभग 50% सेकेंड्री इनफर्टिलिटी के कारण होते हैं. दूसरी बार फर्टिलिटी को इफेक्ट करने वाले कई फैक्टर्स हो सकते हैं, जिनमें ब्लॉक्ड फैलोपियन ट्यूब्स, स्पर्म काउंट जैसी मेल इनफर्टिलिटी प्रॉब्लम्स या फीमेल इनफर्टिलिटी रिस्क फैक्टर्स में चेंज शामिल हैं. सेकेंड्री इनफर्टिलिटी के एक्चुअल कारणों को समझने से  राइट फर्टिलिटी ट्रीटमेंट फाइंड करने और जरूरी सपोर्ट पाने में बहुत हेल्प मिल सकती है. आइए जानें कि ऐसा क्यों होता है और क्या हैं कारण.

क्या है सेकेंड्री इनफर्टिलिटी?

सेकेंड्री इनफर्टिलिटी का मतलब है पहले नॉर्मल डिलीवरी के बाद प्रेग्नेंट होने या बेबी को कंसीव करने में डिफिकल्टी. ये पेल्विक इंफ्लेमेटरी डिजीज, स्कार टिश  या रिप्रोडक्टिव हार्मोन्स को इफेक्ट करने वाले हार्मोनल इम्बैलेंस के कारण हो सकता है. एक्सपर्ट्स कहते हैं कि वर्ल्डवाइड लगभग 10-15% कपल्स इनफर्टिलिटी से इफेक्टेड हैं. सेकेंड्री इनफर्टिलिटी कई फैक्टर्स पर डिपेंड करती है,  सिर्फ उम्र पर नहीं. 

ये हैं सेकेंड्री इनफर्टिलिटी के मुख्य कारण

उम्र से रिलेटेड फर्टिलिटी डिक्लाइन: जैसे-जैसे फीमेल्स की ऐज बढ़ती है, उनके एग्स की क्वालिटी तेजी से गिरने लगती है, खासकर 35 की उम्र के बाद. अमेरिकन कॉलेज ऑफ ऑब्स्टेट्रिशियन एंड गायनेकोलॉजिस्ट्स की मानें तो, 32 से 37 साल की ऐज के बीच एग्स का नंबर लगभग 50% कम हो जाता है. हार्मोन लेवल्स और ओवेरियन डिस्फंक्शन भी आपकी नेचुरली कंसीव करने की एबिलिटी को और ज़्यादा इफेक्ट कर सकते हैं.

ब्लॉक्ड फैलोपियन ट्यूब्स: पेल्विक इन्फेक्शन या ट्यूबल लिगेशन सर्जरी के कारण बनने वाले स्कार टिशू, फैलोपियन ट्यूब्स को ब्लॉक कर सकते हैं. सेक्शुअली ट्रांसमिटेड इन्फेक्शंस कई फीमेल्स में सेकेंड्री इनफर्टिलिटी का एक हिडन रीजन होते हैं. यूटराइन फाइब्रॉइड्स और यूटराइन लाइनिंग प्रॉब्लम्स भी फर्टिलाइज्ड एग को इंप्लांट होने से रोक सकती हैं.

ओव्यूलेशन डिसऑर्डर्स: हार्मोनल डिसऑर्डर्स और रिप्रोडक्टिव एंडोक्राइनोलॉजी से जुड़ी प्रॉब्लम्स ओव्यूलेशन को पूरी तरह से स्टॉप कर सकती हैं.क्लोमिड जैसी फर्टिलिटी मेडिसिन अक्सर सेफली ओव्यूलेशन को इंड्यूस करने के लिए दी जाती हैं. ओवरीजमें स्ट्रक्चरल प्रॉब्लम्स को ठीक करने से कभी-कभी इस सिचुएशन को रिवर्स किया जा सकता है.

यूटराइन या एंडोमेट्रियल इश्यूज: यूटराइन लाइनिंग की पुअर हेल्थ इंप्लांटेशन रेट को इफेक्ट करती है.एंडोमेट्रियोसिस के कारण हेल्दी एग्स स्कार टिशू में ट्रैप हो सकते हैं. मेडिकल ट्रीटमेंट्स से एंडोमेट्रियोसिस को अर्ली स्टेज में ट्रीट करने से सफलता का मौका अधिक होता हैं.

मेल फैक्टर्स जैसे एनलार्ज्ड प्रोस्टेट: स्पर्म प्रोडक्शन  में कमी या पुअर स्पर्म क्वालिटी (मेल फ़र्टिलिटी को इफेक्ट कर सकती है। एनलार्ज्ड प्रोस्टेट या टेस्टिकुलर वैरिकोसेल स्पर्म काउंट और स्पर्म को इफेक्टिवली होल्ड करने की एबिलिटी को इफेक्ट करता है. ब्लड टेस्ट और सीमन एनालिसिस से इनफर्टिलिटी की प्रॉब्लम्स को एक्युरेटली डायग्नोज किया जा सकता है.

लाइफस्टाइल फैक्टर्स और एक्सेसिव वेट गेन: बहुत ज्यादा अल्कोहल, ओबेसिटी और एन्वॉयरमेंटल टॉक्सिन्स हार्मोनल बैलेंस को डिस्टर्ब कर सकते हैं. अगर वेट रिलेटेड प्रॉब्लम्स को मैनेज नहीं किया जाता, तो रिप्रोडक्टिव प्रोसेस ठीक से काम नहीं कर सकती हैं. परमानेंट वेट लॉस से हेल्दी प्रेग्नेंसी के मौके बढ़ जाते हैं.

मेडिकल कंडीशंस: डायबिटीज या थायराइड प्रॉब्लम्स की मेडिकल हिस्ट्री साइलेंट फर्टिलिटी रिस्क क्रिएट करती है. फर्टिलिटी स्पेशलिस्ट से रेगुलर चेकअप कराने से इन्हें जल्दी डिटेक्ट करने में हेल्प मिलती है.इनफर्टाइल कपल्स में अक्सर एक से ज्यादा फैक्टर्स इन्वॉल्व होते हैं.

स्ट्रेस और इमोशनल हेल्थ: इमोशनल स्ट्रेस रिप्रोडक्टिव हार्मोन्स को इफेक्ट करता है. इनफर्टिलिटी ओवरऑल मेंटल हेल्थ पर भी बहुत डिपेंड करती है. शांत और सपोर्टेड रहने से जितना ज्यादातर लोगों को लगता है, उससे कहीं ज्यादा फर्क पड़ता है.

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Disclaimer: खबर में दी गई कुछ जानकारी मीडिया रिपोर्ट्स पर आधारित है. आप किसी भी सुझाव को अमल में लाने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.