15000 घंटे से ज्यादा प्रवचन, अलग-अलग धर्मों के 30 से ज्यादा ग्रंथ और 11 भाषाएं. जब ज्यादातर आध्यात्मिक गुरु अपनी ही परंपरा तक सीमित रहते हैं, गुरुदेव राकेशजी कई परंपराओं के बीच जिस सहजता से आते-जाते हैं, वैसा आज कम ही देखने को मिलता है.

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दक्षिण गुजरात के धरमपुर में एक वीकेंड पर साधकों से भरा हॉल गुरुदेव राकेशजी को सुन रहा है. वह 17वीं सदी के जैन कवि बनारसीदास के काव्य-नाटक 'नाटक समयसार' का एक पद समझाते हैं. एक-एक पंक्ति के साथ आत्मा, कर्म और मुक्ति से जुड़े विचार खुलते जाते हैं.

किसी और साल, किसी और वीकेंड पर यही गुरु भगवद्गीता, कठोपनिषद या आदि शंकराचार्य के 'भज गोविंदम्' की व्याख्या करते मिल सकते हैं. भारत के आध्यात्मिक परिदृश्य में ज्यादातर गुरु एक ही परंपरा के भीतर रहकर बात करते हैं. श्रीमद राजचंद्र मिशन धरमपुर (SRMD) के संस्थापक गुरुदेवश्री ने अपना पूरा अध्यापन इन सीमाओं को पार करने पर ही खड़ा किया है.

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कई धर्मों को समेटता ज्ञान

गुरुदेवश्री अब तक 15000 घंटे से ज्यादा प्रवचन दे चुके हैं. वे अलग-अलग धर्मों के 30 से ज्यादा ग्रंथों की व्याख्या कर चुके हैं और उनकी शिक्षाएं आज 11 भाषाओं में उपलब्ध हैं. जैन परंपरा से उन्होंने श्री उत्तराध्ययन सूत्र पढ़ाया, जिसे भगवान महावीर का अंतिम उपदेश माना जाता है तो आचार्य मानतुंग का लोकप्रिय भक्तामर स्तोत्र भी. उन्होंने 24 तीर्थंकरों को समर्पित 24 रचनाओं के संग्रह स्वयंभूस्तोत्र, योगसार और आत्मा व कर्म के स्वरूप पर तर्कपूर्ण संवाद गणधरवाद की भी व्याख्या की है. इनमें श्रीमद राजचंद्रजी की 142 पदों वाली अमर कृति श्री आत्मसिद्धि शास्त्र भी है, जिस पर उन्होंने 3000 से ज्यादा पन्नों की डॉक्टरेट थीसिस लिखी. इस साल वे मासिक शिविरों की एक शृंखला में नाटक समयसार की व्याख्या कर रहे हैं.

उन्होंने श्री कृष्ण और अर्जुन के अमर संवाद श्रीमद्भगवद्गीता और युवा नचिकेता व यम के संवाद पर आधारित कठोपनिषद की व्याख्या की है. उन्होंने शंकराचार्य के विवेकचूडामणि और भज गोविंदम् के साथ अष्टावक्र गीता, योगवासिष्ठ और नारद भक्ति सूत्र भी पढ़ाए हैं. यहां तक कि गुजरात की संत-कवयित्री गंगासती के लोक भजनों पर भी उन्होंने प्रवचन दिए हैं. जहां भी किसी शिक्षा से श्रोता को खुद को समझने में मदद मिलती हो, वहां उनके प्रवचनों में बाइबल, कुरान और दूसरी परंपराओं की सीख भी शामिल होती है.

जैन पर्व पर गीता

1992 से हर साल गुरुदेवश्री मुंबई में पर्युषण के दौरान प्रवचन-शृंखला देते आ रहे हैं. 2016 में इस मौके के लिए उन्होंने जो ग्रंथ चुना, वह था भज गोविंदम्, यानी एक बिल्कुल अलग परंपरा के आचार्य आदि शंकराचार्य का वेदांतिक स्तोत्र. उससे एक साल पहले उनकी पर्युषण शृंखला का नाम था 'सर्वसम्मत धर्म', यानी वह धर्म जिसे सब स्वीकार करते हैं.

यही खुलापन उनके श्रोताओं में भी दिखता है. इस सितंबर, जब गुरुदेवश्री ने पर्युषण के दौरान मुंबई के डोम एसवीपी स्टेडियम में आठ दिन प्रवचन दिए तो सुनने वालों में पारसी समुदाय की ज़ेनोबिया भी थीं. वे एक दोस्त का मन रखने के लिए अनमने ढंग से पहुंची थीं, लेकिन एक भी दिन नहीं छोड़ा. उन्होंने कहा, 'मैं पारसी हूं, लेकिन राकेश जी ने मुझे पूरी तरह कायल कर दिया.'

इस सोच की जड़ें

गुरुदेवश्री के आध्यात्मिक मार्गदर्शक श्रीमद राजचंद्रजी हैं, 19वीं सदी के वे दार्शनिक, जिन्हें महात्मा गांधी का आध्यात्मिक मार्गदर्शक माना जाता है. जब युवा गांधी ने दक्षिण अफ्रीका से श्रीमदजी को पत्र लिखकर पूछा कि सच्चा धर्म क्या है तो जवाब बेहद उदार था. श्रीमद ने लिखा कि हर व्यक्ति अपने धर्म को ही श्रेष्ठ मार्ग कहता है, लेकिन असल में श्रेष्ठ मार्ग वही है, जो आत्मा को उसके सच्चे स्वरूप तक पहुंचाए, फिर उसका नाम चाहे जो हो. 

गुरुदेवश्री ने मुंबई विश्वविद्यालय से दर्शनशास्त्र में स्वर्ण पदक के साथ एमए और डॉक्टरेट की उपाधि हासिल की. कैलिफोर्निया के क्लेरमॉन्ट स्कूल ऑफ थियोलॉजी ने उन्हें मानद डॉक्टर ऑफ डिविनिटी की उपाधि दी. वह अंधविश्वास की मांग करने के बजाय तर्क से मान्यताओं को परखते हैं और शास्त्रों की कालजयी शिक्षाओं को रोज़मर्रा की सरल भाषा में समझाते हैं. 

सद्भाव के दूत

गुरुदेवश्री का यह खुलापन भारत की सीमाओं से कहीं आगे तक जाता है. वह अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों और अंतरधार्मिक आयोजनों को संबोधित करते हैं और शांति व समाजसेवा के लिए उनके कार्यों को कई वैश्विक मंचों पर सराहा गया है. वह 98 देशों की यात्रा कर चुके हैं और उनका संदेश मिशन एक वाक्य में बताता है: सत्य को उसके हर रूप में स्वीकार करना.

शास्त्रों को हर किसी तक पहुंचाना

धरमपुर आश्रम में होने वाले उनके मासिक वीकेंड सत्संग शिविर निःशुल्क होते हैं और हर साल ये किसी एक पवित्र ग्रंथ पर केंद्रित रहते हैं. बीते वर्षों में ये ग्रंथ अलग-अलग परंपराओं से रहे हैं. उनके प्रवचन ऑनलाइन प्रसारित होते हैं और मिशन की बहुभाषी पहल 'विज़डम विदाउट बॉर्डर्स' उनकी शिक्षाओं को कई भाषाओं में लोगों तक पहुंचा रही है. उनके 60वें वर्ष के उपलक्ष्य में श्री आत्मसिद्धि शास्त्र का 60 भाषाओं में अनुवाद किया गया है.

मिशन उनके बताए मार्ग को ऐसा मार्ग बताता है जो समय, स्थान, आस्था और भूगोल की बंदिशों से मुक्त है. मिशन के शब्दों में, यह सबके लिए और सबके भीतर का मार्ग है. ऐसी दुनिया में जहां धर्म का इस्तेमाल अक्सर लोगों के बीच लकीरें खींचने के लिए होता है. गीता, सूत्रों और दूसरे धर्मों के ग्रंथों में साझा ज़मीन तलाशने वाला गुरु ध्यान खींचता है. उन्हें सुनने वाले हजारों लोगों के लिए संदेश सीधा है: ग्रंथों की भाषा भले अलग हो, लेकिन सब एक ही जगह की ओर इशारा करते हैं, यानी भीतर के आत्मा की ओर.