XI JINPING Dinner Menu: चीन  के राष्ट्रपति शी जिनपिंग सितंबर 2026 में नई दिल्ली में होने वाले ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के लिए दिल्ली आ सकते हैं. अगर यह दौरा तय होता है तो करीब सात साल बाद जिनपिंग भारत आएंगे. ऐसे किसी भी बड़े दौरे में जिस तरह सुरक्षा और प्रोटोकॉल पर बारीकी से काम होता है, ठीक उसी तरह मेहमान राष्ट्राध्यक्ष के खाने-पीने का इंतजाम भी बेहद सोच-समझकर किया जाता है. ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर किसी विदेशी नेता के दौरे पर कैसे मेन्यू तय किया जाता है और उसमें किन बातों का ध्यान रखा जाता है. 

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मेहमान की पसंद और नापसंद जानी जाती है

किसी भी राष्ट्राध्यक्ष के दौरे से पहले मेजबान देश की प्रोटोकॉल टीम और विदेश मंत्रालय मिलकर यह पता करते हैं कि मेहमान नेता को कैसा खाना पसंद है और किन चीजों से परहेज है. इसमें धार्मिक कारण, सेहत से जुड़ी वजहें, एलर्जी और खाने की आदतें, सभी को ध्यान में रखा जाता है. जैसे हाल ही में वियतनाम के राष्ट्रपति तो लाम की भारत यात्रा के दौरान राष्ट्रपति भवन में हुए राजकीय भोज में पंजाब और हरियाणा के पारंपरिक व्यंजन परोसे गए थे, ताकि मेहमान को भारतीय स्वाद का अनुभव भी मिले और खाना उनकी पसंद के मुताबिक भी हो. 

मेजबान देश कैसे तैयार करता है थाली?

आमतौर पर राजकीय भोज में मेजबान देश अपनी संस्कृति और स्थानीय खान-पान की झलक दिखाने की कोशिश करता है. भारत में राष्ट्रपति भवन के बावर्चीखाने में देश के अलग-अलग राज्यों के मशहूर व्यंजनों को मेन्यू में शामिल किया जाता रहा है, ताकि विदेशी मेहमान को भारत की विविधता का एहसास हो सके. हालांकि अगर मेहमान की तरफ से किसी खास परहेज की जानकारी पहले से मिल जाए, तो मेन्यू में उसी हिसाब से बदलाव किया जाता है.

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खाने के टेबल से कूटनीति का संदेश

राजनयिक विशेषज्ञों का मानना है कि विदेशी दौरों पर मेहमान नेता का मेन्यू सिर्फ पेट भरने के लिए नहीं, बल्कि दोनों देशों के सांस्कृतिक जुड़ाव को दिखाने का जरिया होता है. भारत हमेशा अतिथि देवो भव: की परंपरा निभाते हुए चीनी नेताओं के स्वाद और उनके कड़े सुरक्षा नियमों का पूरा सम्मान करता है. 

अगर शी जिनपिंग का भारत दौरा तय होता है, तो जाहिर है उनके लिए भी मेन्यू बनाते वक्त चीन की तरफ से मिली जानकारी और भारत की मेहमाननवाजी की परंपरा, दोनों का ध्यान रखा जाएगा. कुल मिलाकर किसी भी राष्ट्राध्यक्ष के लिए मेन्यू तय करना सिर्फ खाने की प्लानिंग नहीं, बल्कि कूटनीति, संस्कृति और सुरक्षा का एक बारीक मेल होता है, जिसमें हर फैसला सोद-समझकर लिया जाता है. 

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