अक्सर देखा जाता है कि हिंदू धर्म के व्रत-त्योहारों, सात्विक भोजन और पूजा-पाठ में लहसुन और प्याज का इस्तेमाल पूरी तरह वर्जित होता है. लेकिन क्या आप जानते हैं कि इस्लाम में भी लहसुन और प्याज को लेकर खास हिदायतें दी गई हैं? यहां तक कि खुद पैगंबर मोहम्मद भी कच्चा लहसुन और प्याज खाने से परहेज करते थे.
इस्लामिक ग्रंथों और प्रामाणिक हदीसों में इस बात का स्पष्ट वर्णन मिलता है कि लहसुन और प्याज खाने के बाद मस्जिद जाने से क्यों रोका गया है.
क्या कहती है सहीह अल-बुखारी की हदीस?
इस्लाम की सबसे भरोसेमंद किताबों में से एक 'सहीह अल-बुखारी' (हदीस नंबर 855) में लहसुन और प्याज से जुड़ा एक दिलचस्प प्रसंग दर्ज है.
हदीस में हज़रत जाबिर बिन अब्दुल्लाह (रजियल्लाहु अनहु) से वर्णन है कि पैगंबर मोहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने फरमाया.. "जो व्यक्ति लहसुन या प्याज खाए, वह हमसे दूर रहे (या फरमाया: हमारी मस्जिद से दूर रहे) और अपने घर में ही बैठा रहे."
इसी हदीस में आगे एक घटना का जिक्र है कि एक बार पैगंबर साहब के पास पकी हुई सब्जियों का एक बर्तन लाया गया. जब उसमें से उन्हें एक खास गंध महसूस हुई, तो उन्होंने पूछा कि इसमें क्या है? जब उन्हें सब्जियों के नाम बताए गए, तो उन्होंने वह बर्तन अपने एक साथी यानी सहाबी की ओर बढ़ा दिया.
जब उस साथी ने देखा कि पैगंबर साहब खुद इसे नहीं खा रहे हैं, तो उन्होंने भी खाने में संकोच किया. इस पर पैगंबर साहब ने फरमाया:
"तुम खाओ, क्योंकि मैं उनसे (फरिश्तों से) गुप्त रूप से बात करता हूं, जिनसे तुम बात नहीं करते."
सहीह मुस्लिम और अन्य ग्रंथों में भी सख्त हिदायत
इसी तरह 'सहीह मुस्लिम' में भी स्पष्ट निर्देश है कि जो व्यक्ति लहसुन, प्याज या हरा प्याज (गंदना) खाए, जब तक उसके मुंह से गंध खत्म न हो जाए, उसे मस्जिद में प्रवेश नहीं करना चाहिए. अगर कोई व्यक्ति ऐसी गंध के साथ मस्जिद आता है, तो उसे बाहर जाने को कहा जा सकता है ताकि अन्य नमाजियों को तकलीफ न हो,
क्या है इसके पीछे का असली कारण?
इस्लामिक विद्वानों और हदीस की व्याख्या के अनुसार, पैगंबर साहब द्वारा लहसुन-प्याज से परहेज करने के मुख्य रूप से दो कारण थे:
व्यक्तिगत सफाई और सामाजिक शिष्टाचार (Personal Hygiene & Etiquette)-
कच्चा लहसुन या प्याज खाने से मुंह से तेज दुर्गंध आती है. जब लोग मस्जिद में कंधे से कंधा मिलाकर नमाज अदा करते हैं, तो यह दुर्गंध दूसरों का ध्यान भटकाती है और उन्हें परेशान करती है.
फरिश्तों (Angels) का सम्मान:
इस्लामिक मान्यता के अनुसार, मस्जिद में और पैगंबर साहब के पास फरिश्ते (विशेषकर हजरत जिब्रील) संदेश लेकर आते थे. फरिश्तों को भी बदबू से तकलीफ होती है. चूंकि पैगंबर साहब पर 'वही' (ईश्वरीय संदेश) उतरती थी, इसलिए वे स्वयं लहसुन-प्याज खाने से दूर रहते थे.
हिंदू धर्म और इस्लाम के नियमों में क्या है अंतर?
यद्यपि दोनों परंपराओं में लहसुन-प्याज से दूरी की बात आती है, लेकिन दोनों के मूल कारण अलग हैं-
हिंदू (सात्विक) परंपरा में: आयुर्वेद और धार्मिक मान्यताओं के अनुसार लहसुन-प्याज को 'तामसिक' भोजन माना गया है, जो मन में गुस्सा, उत्तेजना और आलस्य बढ़ाता है. इसलिए पूजा-पाठ और आध्यात्मिक साधना में इसे पूरी तरह वर्जित माना जाता है.
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इस्लाम में: यह भोजन 'हराम' (पाप) नहीं है. इसे पकाकर खाने की पूरी इजाजत है क्योंकि पकाने से गंध समाप्त हो जाती है. मनाही केवल कच्चा खाकर सामाजिक या धार्मिक सभाओं (मस्जिद) में जाने से है, ताकि बदबू से दूसरों को असुविधा न हो.
इस सच्चाई से साफ होता है कि चाहे धर्म कोई भी हो, स्वच्छता, दूसरों का ख्याल रखना और अनुशासित जीवन शैली हमेशा से महान विचारकों और पैगंबरों की सीख का हिस्सा रही है. लहसुन-प्याज से परहेज के पीछे की यह वजह वाकई कई लोगों के लिए आंखें खोलने वाली है.
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