पहाड़ी इलाकों में हर साल मानसून के समय भूस्खलन की खौफनाक घटनाएं जीवन और संपत्ति को भारी नुकसान पहुंचाती हैं. हाल ही में हिमाचल प्रदेश के हमीरपुर और शिमला जिलों में देखने को मिला कि देखते ही देखते देवदार और कायल के 35 से 40 मजबूत पेड़ विशाल पहाड़ी ढलान के साथ जमींदोज हो गए. ऐसे में सवाल है कि क्या मौसम विभाग की तरह भूस्खलन का अग्रिम अंदाजा लगाना मुश्किल है? जबकि वैज्ञानिक प्रणालियां और उपग्रह डेटा इसके लिए निरंतर प्रयासरत हैं, फिर भी धरातल पर तकनीक कई बार नाकाम साबित होती है.
पूर्वानुमान लगाने के वैज्ञानिक आधार
बारिश की चेतावनी की भांति भूस्खलन की आशंका का आकलन करना संभव तो है, लेकिन इसकी प्रक्रिया काफी पेचीदा होती है. भूवैज्ञानिक और मौसम विशेषज्ञ वर्षा के स्तर, जमीनी हलचल और स्थानिक बदलावों के आधार पर संभावित खतरों का खाका तैयार करते हैं. इसके लिए विशिष्ट पैमानों का उपयोग किया जाता है.
वर्षा की सीमा रेखा- लगातार तेज बारिश के आंकड़ों से यह अंदाजा लगाया जाता है कि किस ढलान की मिट्टी जल से संतृप्त होकर बह सकती है.
सतह पर बदलाव की मैपिंग- जीपीएस और स्पेशल मैपिंग टूल्स की मदद से पर्वतीय ढलानों के खिसकने की गति को मापा जाता है.
भौतिक चेतावनी के संकेत- सड़कों और मकानों की दीवारों पर उभरती नई दरारें, वृक्षों का असामान्य रूप से झुकना तथा जलस्रोतों के बहाव का अचानक बदलना खतरे के स्पष्ट संकेत होते हैं.
स्थानीय विषमताओं का प्रभाव
मौसम प्रणाली का अलर्ट तो विस्तृत जिले या संभाग के आधार पर जारी हो सकता है, लेकिन भूस्खलन बेहद संकुचित और विशिष्ट स्थान पर घटित होता है. किसी एक ही पर्वत श्रृंखला का एक हिस्सा पल भर में दरक सकता है जबकि ठीक उसी के पास का भाग स्थिर बना रहता है. प्रत्येक पहाड़ी ढलान का सूक्ष्म स्तर पर परीक्षण करने हेतु हर स्थान पर यांत्रिक उपकरण स्थापित करना व्यावहारिक दृष्टि से लगभग नामुमकिन होता है.
यह भी पढ़ें: बाबा नीब करौरी के पास कितनी थी प्रॉपर्टी, जानें अब किसके पास मालिकाना हक?
बहु-आयामी कारकों की जटिलता
केवल भारी वर्षा ही जमीन ढहने की एकमात्र वजह नहीं होती, बल्कि इसके पीछे कई छिपे हुए कारण एक साथ काम करते हैं. जब तक इन सभी घटकों का एक साथ वास्तविक समय में विश्लेषण न हो, सटीक निष्कर्ष पर पहुंचना असंभव होता है.
चट्टानों और मिट्टी की संरचना- भूमि की आंतरिक बनावट, पत्थरों के प्रकार और उसमें मौजूद सूक्ष्म दरारें महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं.
जल दबाव की स्थिति- मिट्टी के भीतर जल सोखने की सीमा और आंतरिक जल दबाव का बढ़ना ढलान को अस्थिर कर देता है.
मानवीय हस्तक्षेप व प्राकृतिक हलचल- निर्माण कार्यों के लिए की जाने वाली ब्लास्टिंग, वनों का निरंतर कटाव और टेक्टोनिक प्लेटों की अदृश्य हलचलें भी इसे ट्रिगर करती हैं.
दुर्गम भूगोल और निगरानी की सीमाएं
हिमालयन बेल्ट अथवा पश्चिमी घाट जैसे अत्यधिक संवेदनशील एवं तीव्र ढलान वाले क्षेत्रों में सैटेलाइट और रडार तकनीक भी बेअसर हो जाती है. इन इलाकों में मौजूद घने जंगल और सीधी ढलानें अंतरिक्षीय इमेजरी के मार्ग में रुकावट बनती हैं, जिससे जमीन के आंतरिक हिस्सों का सटीक वैज्ञानिक अध्ययन बाधित हो जाता है.
सेंसर नेटवर्क की अपर्याप्तता
विश्वसनीय पूर्व चेतावनी के लिए बड़े पैमाने पर टिल्टमीटर और मृदा नमी मापक यंत्रों की आवश्यकता होती है. यद्यपि भारत में आईआईटी मंडी जैसी संस्थाएं कम लागत वाले अलर्ट सिस्टम पर कार्य कर रही हैं और जीएसआई लैंडस्लाइड अर्ली वार्निंग सिस्टम (LEWS) को विस्तार दे रहा है, फिर भी हर संवेदनशील पहाड़ी तक इस नेटवर्क की पहुंच अभी स्थापित नहीं हो सकी है.
संस्थागत समन्वय और डेटा प्रोसेसिंग
भूस्खलन पूर्वानुमान में एक बड़ी बाधा विभिन्न वैज्ञानिक संस्थाओं के बीच रीयल-टाइम डेटा के एकीकरण की कमी है. मौसम विभाग वर्षा का डेटा देता है, जीएसआई भूवैज्ञानिक संरचना का विश्लेषण करता है और इसरो अंतरिक्षीय तस्वीरें उपलब्ध कराता है. इन सभी जानकारियों को एक ही एकीकृत डिजिटल प्लेटफॉर्म पर प्रोसेस करने का ढांचा अभी विकास के चरण में है.
यह भी पढ़ें: राष्ट्रपति का ADC शादी क्यों नहीं कर सकता, क्यों बनाया गया यह नियम?
