भारत में राष्ट्रपति भवन की गरिमा और सुरक्षा की जिम्मेदारी संभालने वाले एडीसी (एडे-डी-कैंप) का पद जितना सम्मानजनक है, उतना ही कठिन भी होता है. पूर्व राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के साथ करीब तीन साल तक इस महत्वपूर्ण पद पर सेवा देने वाले मेजर ऋषभ सिंह सांब्याल ने एक पॉडकास्ट के दौरान इस भूमिका के अनदेखे पहलुओं को सामने रखा. उन्होंने बताया कि किस तरह देश की सबसे बड़ी संवैधानिक हस्ती की सुरक्षा और प्रोटोकॉल में तैनात अधिकारी को अपनी व्यक्तिगत प्राथमिकताओं का त्याग करना पड़ता है, जिसमें शादी न करने जैसे कड़े नियम भी शामिल हैं. चलिए जानें कि यह नियम क्यों बनाया गया.

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शादी से जुड़ा नियम और शर्तें

राष्ट्रपति के एडीसी के रूप में चयन होने वाले अधिकारियों के लिए कुछ सख्त नियम बनाए गए हैं. इस सेवा के दौरान सबसे अहम क्लॉज यह होता है कि संबंधित अधिकारी अपने कार्यकाल के दौरान शादी नहीं कर सकता है. दरअसल, यह पद चौबीसों घंटे की सतर्कता और समर्पण की मांग करता है. देश के सर्वोच्च पद की सेवा में तैनात होने के कारण अधिकारी का पूरा ध्यान केवल अपनी आधिकारिक जिम्मेदारियों पर होना अनिवार्य माना जाता है. इसी वजह से पारिवारिक और निजी जिम्मेदारियों को इस अवधि में पीछे रखना पड़ता है.

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अत्यधिक कार्यभार और निरंतर तत्परता

एडीसी की भूमिका महज औपचारिक कार्यक्रमों में राष्ट्रपति के पीछे खड़े होने तक सीमित नहीं होती. राष्ट्रपति भवन से लेकर देश-विदेश के दौरों तक, हर क्षण की समय सारणी, सुरक्षा व्यवस्था और प्रोटोकॉल का सटीक पालन कराना इन्हीं अधिकारियों का काम होता है. इस वजह से अधिकारी को हर समय मानसिक और शारीरिक रूप से सतर्क रहना पड़ता है. किसी भी क्षण कोई नई जिम्मेदारी आ सकती है, इसलिए उनके पास खुद के लिए या अपने निजी कामों के लिए बिल्कुल भी समय नहीं बचता है.

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सामाजिक जीवन से दूरी और बंदिशें

सर्वोच्च सुरक्षा व्यवस्था का हिस्सा होने के कारण एडीसी का सार्वजनिक जीवन लगभग खत्म हो जाता है. एक आम नागरिक या सेना के अन्य अधिकारियों की तरह दोस्तों के साथ अचानक कहीं बाहर जाना या परिवार के साथ समय बिताना इस पद पर संभव नहीं होता है. अधिकारी को हर समय राष्ट्रपति की सुरक्षा और दिनचर्या से जुड़ी जरूरतों के इर्द-गिर्द ही रहना पड़ता है. इस सामाजिक विरक्ति की वजह से अधिकारी का दायरा बेहद सीमित हो जाता है और वह निजी जिंदगी के कई आम पलों का आनंद नहीं ले पाता है.

एकंतवास और मानसिक स्थिति पर प्रभाव

लगातार प्रोटोकॉल और सुरक्षा घेरे में रहने के बावजूद इस पद पर तैनात अधिकारियों को एक अलग तरह के अकेलेपन से गुजरना पड़ता है. हर समय बेहद गंभीर और जिम्मेदार माहौल में काम करने के कारण वे अपनी भावनाएं या बातें हर किसी से साझा नहीं कर सकते हैं. हालांकि, इस कठिन स्थिति को कई अधिकारी आत्म-मंथन के अवसर के रूप में देखते हैं. एकांत के इन पलों का उपयोग अपनी आदतों को सुधारने, खुद को बेहतर बनाने और अपने विचारों को स्पष्ट रखने के लिए किया जाता है.

निजी त्याग और पेशेवर निष्ठा

राष्ट्रपति के साथ काम करने वाले अधिकारियों का पूरा जीवन एक अनुशासित ढांचे में ढल जाता है. जहां एक तरफ उन्हें देश के सबसे प्रतिष्ठित भवन में सेवा देने का गौरव मिलता है, वहीं दूसरी तरफ उन्हें अपनी व्यक्तिगत खुशियों और पारिवारिक योजनाओं को कुछ समय के लिए स्थगित करना पड़ता है. ड्यूटी की इस अवधि में अधिकारी का कोई भी निजी शेड्यूल नहीं होता, उसका हर दिन राष्ट्रपति की गतिविधियों और देश की संवैधानिक प्राथमिकताओं के आधार पर ही तय होता है.

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