तीन महीने से ज्यादा वक्त तक चली अमेरिका और ईरान की जंग का फाइनली अंत हो चुका है. दोनों देशों के बीच शांति समझौते पर डील हो चुकी है, लेकिन इसके उलट करीब चार साल से ज्यादा वक्त से चल रही रूस और यूक्रेन की जंग तो खत्म होने का नाम ही नहीं ले रही है. बारूद और तबाही के ढेर पर बैठे दोनों देश पीछे हटने का नाम ही नहीं ले रहे हैं. दरअसल इस युद्ध को लंबा खींचने के पीछे कुछ शर्तें और मुद्दे हैं, जिनपर बात नहीं बन पा रही है, दोनों ही देश किसी कीमत पर समझौता करने के लिए तैयार नहीं हैं, चलिए जानें.

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दोनों देशों की जिद और पुतिन का निर्णय

रूस और यूक्रेन में शांति की राह में सबसे बड़ा रोड़ा दोनों देशों के अपने-अपने रणनीतिक और राजनैतिक लक्ष्य हैं, जो कि एक-दूसरे से बिल्कुल उल्टे हैं. पुतिन चाहते हैं कि इस पूरे क्षेत्र पर मॉस्को का दबदबा कायम रहे. रूस की जिद है कि जब तक यूक्रेन की राजधानी कीव पूरी तरह से आत्मसमर्पण नहीं कर देती है, तब तक रूसी सेना डटी रहेगी. वहीं दूसरी तरफ यूक्रेन के राष्ट्रपति जेलेंस्की भी अपनी आजादी, संप्रभुता और सम्मान के साथ कोई समझौता नहीं करना चाहते हैं, इसीलिए दोनों देश आमने-सामने हैं. 

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जमीन के टुकड़ों का विवाद

इस जंग के न रुकने की बड़ी वजह जमीनी नियंत्रण को लेकर विवाद माना जा रहा है. यूक्रेन की स्पष्ट मांग है कि उसे 1991 की उसकी अंतरराष्ट्रीय सीमाएं वापस कर दी जाएं, मतलब कि रूस को क्रीमिया समेत यूक्रेन के सारे हिस्से को छोड़ना होगा. लेकिन रूस का इस पर एकदम विपरीत मत है. पुतिन सरकार का कहना है कि यूक्रेन को क्रीमिया के साथ-साथ दोनेत्स्क, लुहांस्क, खेरसॉन और जापोरिझिया जैसे बड़े राज्यों पर रूसी अधिकार को मानना होगा, जिसे यूक्रेन अपनी संप्रभुता का हनन मानता है.

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नाटो की सदस्यता जंग की मुख्य वजह

यूक्रेन को डर है कि भविष्य में कभी भी रूस उसके ऊपर कोई हमला न कर दे, ऐसे में अपनी सुरक्षा के लिए वह पश्चिमी देशों के सैन्य गठबंधन नाटो में खुद को शामिल करना चाहता है. वह चाहता है कि नाटो उसे कानूनी रूप से सुरक्षा की गारंटी दे. इधर रूस इस पूरी जंग की वजह नाटो के विस्तार को मानता है. रूस की शर्त है कि यूक्रेन को हमेशा गुटनिरपेक्ष रहना होगा, मतलब कि यूक्रेन कभी भी नाटो का सदस्य नहीं बनेगा और न ही किसी पश्चिमी देश की सेना या हथियार को तैनात होने देगा.

यूक्रेन का पूरी तरह से वि-सैन्यीकरण

रूस चाहता है कि यूक्रेन का पूरी तरह से वि-सैन्यीकरण कर दिया जाए, यानि कि यूक्रेन की सीमा बेहद सीमित कर दिया जाए, ताकि रूस के लिए वह कभी खतरा न बन सके. यूक्रेन इस शर्त को मानने से हमेशा इनकार करता आया है, क्योंकि सेना न होने का मतलब है पूरी तरह से लाचार होना. यूक्रेन की शर्त है कि युद्ध के दौरान तबाही मचाने वाले रूसी नेताओ पर अपराध का मुकदमा चलाया जाए और रूस से हर्जाना वसूला जाए, जबकि रूस इन मांगों को मानने के लिए तैयार नहीं है.

दोनों देशों को बाहरी सहारा

इस युद्ध के लगातार जारी रहने के पीछे एक वजह यह भी मानी जाती है कि अमेरिका और यूरोप के देश यूक्रेन को बैक डोर से आर्थिक मदद करते हैं. लेकिन उनकी मदद सिर्फ इसलिए है कि यूक्रेन युद्ध में लगातार टिका रहे. वहीं रूस के खिलाफ दुनियाभर के प्रतिबंधों का असर बेअसर साबित हो रहा है, क्योंकि उसे मॉस्को, चीन और उत्तर कोरिया जैसे देशों से लगातार सहयोग मिल रहा है.

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