Politicians Retirement: ज्यादातर पेशों में रिटायरमेंट एक तय पड़ाव होता है. सरकारी कर्मचारी, जज और प्राइवेट सेक्टर के कर्मचारी सभी एक खास उम्र पर पहुंचने के बाद अपने पद से हट जाते हैं. लेकिन राजनीति में नियम बिल्कुल अलग होते हैं. भारत और अमेरिका जैसे लोकतंत्रों में नेताओं के लिए रिटायरमेंट की कोई भी उम्र नहीं होती. इससे अक्सर एक आम सवाल उठता है. आखिर राजनेता 70 या फिर 80 साल की उम्र तक भी सत्ता में क्यों बने रहते हैं. 

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क्या है नियम? 

राजनेताओं के रिटायर ना होने की सबसे बड़ी वजह यह है कि वे सत्ता में कैसे आते हैं. सरकारी अधिकारियों के उलट राजनेताओं को जनता चुनती है. लोकतंत्र में सबसे बड़ी सत्ता मतदाताओं के पास होती है. अगर लोग किसी नेता का समर्थन करते रहते हैं तो उन्हें पद पर बने रहने से रोकने वाली कोई भी कानूनी रुकावट नहीं होती.

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अनुभव को ताकत माना जाता है 

राजनीति में उम्र को अक्सर कमजोरी के बजाए समझदारी और अनुभव से जोड़ा जाता है. वरिष्ठ नेताओं को संकट, बातचीत और अंतरराष्ट्रीय संबंधों को संभालने में ज्यादा काबिल माना जाता है.  दशकों का उनका अनुभव एक राजनीतिक फायदा बन सकता है. इससे उन्हें बुढ़ापे में भी अपना प्रभाव बनाए रखने में मदद मिलती है. 

भारत में क्या नियम? 

भारत में संविधान में सिर्फ राजनीति में आने के लिए जरूरी न्यूनतम उम्र तय की गई है. लोकसभा के लिए 25 साल और राज्यसभा के लिए 30 साल. सांसदों, मुख्यमंत्री या फिर प्रधानमंत्री के लिए भी उम्र की कोई ऊपरी सीमा तय नहीं है. 

हालांकि राजनीतिक पार्टियां कुछ अनौपचारिक दिशा निर्देशों का पालन कर सकती हैं. उदाहरण के लिए भारतीय जनता पार्टी में एक अलिखित नियम है कि 75 साल से ज्यादा उम्र के नेताओं को सक्रिय भूमिकाओं से हटाकर अक्सर सलाहकार पदों पर भेज दिया जाता है. 

संयुक्त राज्य अमेरिका में क्या नियम? 

अमेरिका में भी राजनीतिक नेताओं के लिए कोई अधिकतम उम्र सीमा नहीं है. राष्ट्रपति पद दो कार्यकाल तक सीमित है लेकिन उम्र कोई मायने नहीं रखती. डोनाल्ड ट्रंप और जो बाइडेन जैसे नेताओं ने ज्यादा उम्र में भी चुनाव लड़ा है और पद संभाला है. 

बाकी देशों में क्या है नियम? 

चीन जैसे देशों में एक समय 7 अप 8 डाउन नाम का एक अनौपचारिक रिटायरमेंट नियम था. यह नेताओं को लगभग 68 साल की उम्र में पद छोड़ने के लिए प्रोत्साहित करता था. हालांकि राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने इन पुरानी रीतियों को छोड़ दिया है. इसी तरह रूस में भी एक ऐसा ही संवैधानिक बदलाव हुआ है.

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