Amarnath Shivling Melting: अमरनाथ यात्रा की शुरुआत के साथ ही इस बार ऐसी खबर सामने आई है जिसने शिवभक्तों को हैरान कर दिया है. अमरनाथ की पवित्र गुफा में प्राकृतिक रूप से बनने वाला शिवलिंग यात्रा शुरू होने के महज पांच दिनों के भीतर ही तेजी से सिमट गया है. करोड़ों लोगों की आस्था का केंद्र माने जाने वाले बाबा बर्फानी के इस तरह अचानक अंतर्ध्यान होने से हर कोई अचंभित है. पहले जो शिवलिंग पूरे सावन मास तक शान से चमकता था, वह अब इतनी जल्दी क्यों ओझल हो रहा है? यह सवाल अब सिर्फ आस्था का नहीं, बल्कि इसके पीछे प्रकृति और पर्यावरण के कई गंभीर वैज्ञानिक संकेत छिपे हुए हैं. चलिए जानें.
महज पांच दिन में पिघला शिवलिंग
इस साल जुलाई की शुरुआत में शुरू हुई यात्रा में रिकॉर्ड तोड़ भीड़ देखी जा रही है. शुरुआती चार दिनों में ही करीब 85 हजार से ज्यादा लोग दर्शन कर चुके हैं. लेकिन बाद में पहुंचने वाले श्रद्धालुओं को बाबा बर्फानी का वह विशाल स्वरूप देखने को नहीं मिल रहा है, जिसकी वे उम्मीद कर रहे थे. अमरनाथ गुफा में जुलाई के पहले हफ्ते तक शिवलिंग का ज्यादातर हिस्सा पिघल चुका है. अचानक आए इस बदलाव ने विज्ञान और पर्यावरण के जानकारों को इस पर गरहाई से सोचने के लिए मजबूर कर दिया है.
गुफा में कैसे बनता है शिवलिंग?
अमराथ की पवित्र गुफा में शिवलिंग का निर्माण किसी कृत्रिम तरीके से नहीं होता, बल्कि यह पूरी तरह से प्राकृतिक प्रक्रिया है. गुफा की छत से पानी की बूंदें लगातार नीचे की तरफ टपकती रहती हैं. चूंकि वहां पर तापमान बेहद कम होता है, इसलिए ये बूंदें जमकर एक खंभे का आकार ले लेती हैं, जिसे विज्ञान की भाषा में स्टैलेग्माइट कहा जाता है. यही ठोस बर्फ का खंभा हिंदू धर्म में बाबा बर्फानी का पूज्यनीय रूप है. इसका पूरा अस्तित्व सर्दी के मौसम में होने वाली बर्फबारी, हवा के रुख और गुफा के अंदर की ठंडक पर निर्भर होता है. इसमें अगर जरा भी बदलाव हो तो वह टिक नहीं पाता है.
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समय से पहले क्यों अंतर्ध्यान हुए बाबा बर्फानी?
पिछले कुछ सालों में पूरे हिमालय क्षेत्र और जम्मू-कश्मीर के मौसम चक्र में बहुत बड़ा उलटफेर देखने को मिला है. सर्दियों के दिनों में पहाड़ों पर वैसी बर्फबारी नहीं हो रही है जैसी पहले हुआ करती थी. इसके विपरीत, गर्मियों के महीनों में सूरज की तपिश सामान्य से कहीं ज्यादा दर्ज की जा रही है. मौसम वैज्ञानिकों के मुताबिक, सर्दियों में पर्याप्त ठंड न होने की वजह से गुफा का आधार मजबूत नहीं हो पाता है और गर्मियों की शुरुआत होते ही बर्फ तेजी से पानी में बदलने लगती है. यही वजह है कि अगस्त तक टिकने वाले बाबा बर्फानी अब शुरुआती दिनों में ही ओझल हो रहे हैं.
पहाड़ों का बदलता मौसम और कम होती बर्फबारी
ग्लोबल वॉर्मिंग यानी धरती के बढ़ते तापमान को इस पूरी समस्या की सबसे बड़ी जड़ माना जा रहा है. कश्मीर घाटी में जून और जुलाई के दौरान अब भीषण गर्मी पड़ने लगी है. ऊंचे पहाड़ी इलाकों में भी अब ठंडक महसूस नहीं हो रही है, जो कि कभी सर्दियों और बर्फ की पहचान होते थे. तापमान में लगातार हो रही बढ़ोतरी की वजह से और असामान्य चलने वाली गर्म हवाओं के कारण बर्फ के प्रकृतिक ढांचे अपना अस्तित्व नहीं बता पा रहे हैं. पिछले तीन-चार सालों का रिकॉर्ड देखें तो यह साफ हो जाता है कि मौसम का यह उतार-चढ़ाव हर साल बाबा बर्फानी के आकार को छोटा कर रहा है.
इंसानी गतिविधियों से प्रभावित होता शिवलिंग
मौसम के अलावा स्थानीय स्तर पर होने वाली इंसानी गतिविधियां भी इस नाजुक माहौल को प्रभावित करती हैं. यात्रा के दौरान लाखों श्रद्धालुओं की लगातार आवाजाही से गुफा के आसपास का तापमान थोड़ा बढ़ जाता है. इंसानी शरीर की गर्मी, गुफा के पास कृत्रिम रोशनी का इंतजाम, हेलीकॉप्टरों की उड़ान, गाड़ियों का धुआं और खच्चरों की आवाजाही भी पर्यावरण पर दबाव बनाते हैं. हालांकि वैज्ञानिकों का मानना है कि इन स्थानीय कारणों से ज्यादा वैश्विक स्तर पर बदल रही जलवायु की वजह से नुकसान देखने को मिल रहा है, जिसे रोकने के लिए कड़े कदम उठाने की जरूरत है.
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