Wooden  Doors: लकड़ी के दरवाजे हजारों सालों से घरों का हिस्सा रहे हैं. लेकिन क्या आपने कभी यह सोचा है कि प्राचीन काल में लोग लोहे, पत्थर या फिर दूसरी किसी चीज के बजाय लकड़ी के दरवाजे ही क्यों बनवाते थे? दरअसल इसका जवाब विज्ञान, टेक्नोलॉजी और व्यावहारिकता के संयोजन में छुपा है.

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प्राकृतिक उपलब्धता ने लकड़ी को पहली पसंद बनाया 

प्राचीन काल में जंगल निर्माण सामग्री के प्राथमिक स्रोत थे. सागवान, भारतीय शीशम, नीम और महुआ जैसी हाई क्वालिटी की लकड़ी कई क्षेत्रों में मौजूद थी. पीवीसी, एल्युमिनियम, प्लाईवुड और इंजीनियर्ड लकड़ी जैसी आधुनिक सामग्री उस समय मौजूद नहीं थी. इसी के साथ बड़े लोहे या फिर कांसे के दरवाजों को बनाने के लिए एडवांस्ड धातु प्रौद्योगिकी की जरूरत होती थी. यही वजह है कि घरेलू दरवाजों के लिए लकड़ी सबसे व्यावहारिक विकल्प के रूप में उभरी.

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मजबूत सुरक्षा 

बीती शताब्दियों में सुरक्षा सबसे बड़ी चिंता हुआ करती थी. घरों को न सिर्फ चोरों से बल्कि जंगली जानवरों से भी बचाना पड़ता था. सागवान और शीशम जैसी घनी और मजबूत लकड़ी को उस समय मौजूद उपकरणों का इस्तेमाल करके तोड़ना या फिर काटना काफी मुश्किल था. इसने महंगी सामग्री या फिर जटिल निर्माण तकनीक की जरूरत के बिना लकड़ी के दरवाजे को एक विश्वसनीय सिक्योरिटी बना दिया.

बनाने में आसानी 

लकड़ी के दरवाजे को बनाने के लिए सिर्फ छेनी, हथौड़े और कुल्हाड़ी की ही जरूरत होती थी. इस काम में माहिर बढ़ई स्थानीय जरूरत के मुताबिक लकड़ी को आसानी से काट सकते थे. 

इसी के साथ लोहे या फिर कांसे के दरवाजों को बनाने में धातु का खनन करना, उन्हें भट्टी में पिघलाना, उनका आकार ढालना और उनके भारी वजन को लेकर जाना शामिल था. यह एक ऐसी प्रक्रिया थी जो काफी महंगी और तकनीकी रूप से मांग वाली थी.

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भारी दरवाजे नहीं उठा पाती थी दीवारें 

ज्यादातर पारंपरिक घर कंक्रीट के बजाय मिट्टी, चूने, पत्थर या फिर ईंट का इस्तेमाल करके बनाए गए थे. भारी पत्थर या फिर लोहे के दरवाजे इन इमारत पर काफी ज्यादा दबाव डाल सकते हैं. इससे दरार या फिर नुकसान का खतरा बढ़ सकता है. लकड़ी के दरवाजे ताकत और वजन के बीच एक ठीक संतुलन देते हैं. 

काफी कम रखरखाव 

बुनियादी रखरखाव के साथ लकड़ी के दरवाजे पीढ़ियों तक चल सकते हैं. लोहे के उलट जो नमी के संपर्क में आने पर जंग खा जाता है ठीक से पकाई गई लकड़ी दशकों या फिर सदियों तक टिकाऊ रहती है.

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