दिल्ली का जंतर-मंतर दशकों से किसानों, पहलवानों, छात्रों और राजनीतिक दलों के उग्र विरोध-प्रदर्शनों और धरना स्थल का केंद्र रहा है. इस वक्त दिल्ली के जंतर-मंतर पर नीट पेपक लीक को लेकर सीजेपी के कार्यकर्ता और छात्रों का उग्र प्रदर्शन देखने को मिल रहा है. वहीं दूसरी तरफ जयपुर के जंतर-मंतर पर कभी भी कोई भी धरना प्रदर्शन देखने को नहीं मिला. अब जब दिल्ली में धरना चल रहा है तो ऐसे में लोगों के मन में एक सवाल आना लाजमी है कि आखिर एक ही नाम और एक ही दौर की दो विरासतों की स्थिति इतनी अलग क्यों है, चलिए जानें.

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दिल्ली और जयपुर के जंतर-मंतर का कब हुआ था निर्माण?

इन दोनों ऐतिहासिक वेधशालाओं का निर्माण जयपुर के राजा महाराजा सवाई जयसिंह द्वितीय ने कराया था, लेकिन इसकी स्थापना के समय में बड़ा अंतर देखने को मिलता है. दिल्ली के जंतर-मंतर की स्थापना सबसे पहले साल 1724 में हुई थी, जो देश की बनी पांच वेधशालाओं में सबसे पुरानी मानी जाती है. इसके ठीक 10 साल के बाद यानी 1734 में महाराजा जयसिंह ने जयपुर के जंतर-मंतर का निर्माण कराया था. आकार के दृष्टिकोण से देखें को जयपुर का जंतर-मंतर दिल्ली वाले परिसर की तुलना में काफी बड़ा है और यहां अधिक विशाल और विस्तृत संरचनाएं हैं.

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जयपुर जंतर-मंतर पर क्यों नहीं होता विरोध-प्रदर्शन?

संरक्षण और अंतरराष्ट्रीय महत्व के आधार पर भी दोनों में बड़ा फर्क देखने को मिलता है. जयपुर के जंतर-मंतर को उसके विशाल आकार और अद्भुत बनावट और उत्कृष्ट रखरखाव की वजह से यूनेस्को ने विश्व धरोहर स्थल घोषित किया है, यहां पर दुनिया की सबसे बड़ी पत्थर की धूपघड़ी सम्राट यंत्र मौजूद है. इसके विपरीत राजधानी दिल्ली में स्थित जंतर-मंतर को एक राष्ट्रीय महत्व का संरक्षित स्मारक तो माना गया है, लेकिन इसे यूनेस्को की अंतरराष्ट्रीय धरोहरों की सूची में शामिल होने का दर्जा नहीं प्राप्त है. इसीलिए जयपुर जंतर-मंतर पर प्रदर्शन नहीं होते हैं.

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प्रशासनिक नियम और तय प्रदर्शन स्थल

जयपुर शहर में प्रशासन द्वारा धरने और विरोध-प्रदर्शन आयोजित करे के लिए अलग से स्थान निर्धारित किए गए हैं. जब भी किसी संगठन या जनता को अपनी मांगों को लेकर विरोध दर्ज कराना होता है, तो जयपुर पुलिस और जिला प्रशासन उन्हें कलेक्टर सर्किल के पास स्थित शहीद स्मारक या रामलीला मैदान जाने की अनुमति देता है. इस प्रशासनिक व्यवस्था की वजह से पर्यटन और विरासत से जुड़े ऐतिहासिक स्थलों जैसे जंतर-मंतर को सार्वजनिक भीड़-भाड़ और राजनीतिक प्रदर्शन से दूर ही रखा जाता है.

दिल्ली के जंतर-मंतर के धरना स्थल बनने की वजह

दूसरी तरफ दिल्ली का जंतर-मंतर 1990 के दशक में धीरे-धीरे देश का सबसे बड़ा और आधिकारिक विरोध-प्रदर्शन स्थल बन गया. संसद भवन और केंद्रीय मंत्रालयों के करीब होने के कारण यह जगह केंद्रीय विकल्प मानी जाती है, जहां भारी भीड़ को नियंत्रित किया जा सके. दिल्ली में संसद मार्ग के पास इस सीमित क्षेत्र को कानून-व्यवस्था बनाए रखने के उद्देश्य से नामित किया जाने लगा और यह सार्वजनिक आंदोलनों की स्थायी जगह बन गया.

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