Monk Culture: कई बौद्ध भिक्षुओं, खासकर चीनी शाओलिन और हान बौद्ध भिक्षुओं, के सिर पर गोल निशान दिखाई देते हैं. इन्हें जीबा कहा जाता है. ये निशान एक पवित्र दीक्षा समारोह के दौरान जलती हुई अगरबत्ती से बनाए जाते हैं. सदियों से यह निशान भिक्षु की बौद्ध सिद्धांत, अनुशासन और निस्वार्थ भाव के प्रति अपना जीवन समर्पित करने की इच्छा को दर्शाते रहे हैं.
संकल्प और दृढ़ निश्चय का प्रतीक
जब कोई भिक्षु औपचारिक दीक्षा लेता है तो वह कई धार्मिक संकल्प लेता है और सख्त आध्यात्मिक नियमों का पालन करने का वचन देता है. इस प्रक्रिया के दौरान सिर पर जलती हुई अगरबत्तियां तब तक रखी जाती हैं जब तक वे अपने आप बुझ न जाए. इससे एक स्थायी निशान बन जाते हैं. हर निशान एक संकल्प, नियम या फिर प्रतिबद्धता का प्रतीक होता है.
निशानों की संख्या का मतलब
निशानों की संख्या परंपरा और आध्यात्मिक उपलब्धि के मुताबिक अलग-अलग होती है. आमतौर पर इनकी संख्या 3, 6, 9 और 12 होती है. तीन निशान बौद्ध धर्म के तीन रत्नों के प्रति समर्पण को दर्शाते हैं. ये तीन रत्न हैं बुद्ध, धर्म, संघ. नौ निशान आमतौर पर शाओलिन भिक्षु से जुड़े होते हैं. वे मठ के मुख्य सिद्धांतों और आचरण के नियमों का पालन करने का प्रतीक हैं.
12 निशानों को आध्यात्मिक प्रतिबद्धता का उच्चतम स्तर माना जाता है. यह अक्सर उन भिक्षुओं से जुड़े होते हैं जिन्होंने बोधिसत्व का मार्ग अपनाया है. इसी के साथ करुणा और दूसरों की सेवा पर केंद्रित धार्मिक संकल्प लिए हैं.
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अहंकार और मोह त्यागने का प्रतीक
अगरबत्ती जलाने की रस्म का उद्देश्य भिक्षु की शारीरिक तकलीफ सहने और शरीर के प्रति मोह से ऊपर उठने की क्षमता को दर्शाना भी है. बिना किसी विरोध के दर्द को स्वीकार करके भिक्षु आत्म अनुशासन, मानसिक शक्ति और सांसारिक इच्छाओं से डिटैचमेंट का प्रदर्शन करता है.
आत्म समर्पण का काम
कुछ बहुत परंपराओं में इस रस्म को बुद्ध और बौधिसत्वों के प्रति भेंट और आत्म समर्पण के रूप में देखा जाता है.यह इस बात को दिखाता है कि भिक्षु ने व्यक्तिगत फायदे के बजाय आध्यात्मिक विकास, करुणा और सेवा के प्रति समर्पित रास्ते को चुना है. इस वजह से ये निशान धर्म के प्रति समर्पण और ज्ञान प्राप्ति की खोज के प्रतीक बन जाते हैं.
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