भारत में मानवाधिकारों की सुरक्षा एक संवेदनशील मुद्दा है और इनमें सबसे गंभीर मामले होते हैं कस्टोडियल डेथ यानी पुलिस या न्यायिक हिरासत में हुई मौतें. ऐसे मामलों में अक्सर पुलिस या जेल प्रशासन पर गंभीर आरोप लगते हैं, जिनमें शारीरिक प्रताड़ना, गैरकानूनी हिरासत और मेडिकल सहायता से इनकार जैसे पहलू शामिल होते हैं. दुर्भाग्यपूर्ण रूप से, देश के कुछ राज्यों में यह समस्या और भी अधिक गंभीर रूप ले चुकी है.

कौन-सा राज्य है सबसे ऊपर?

1 अगस्त 2023 को संसद में एक सवाल के जवाब में गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय ने देशभर में पुलिस हिरासत में होने वाली मौतों के आंकड़े पेश किए. यह आंकड़े 1 अप्रैल 2018 से 31 मार्च 2023 की अवधि के हैं. इस पांच साल की अवधि में सबसे ज्यादा पुलिस हिरासत में मौतें गुजरात में दर्ज की गईं.

रिपोर्ट के अनुसार, गुजरात में कुल 81 लोगों की मौत पुलिस हिरासत में हुई, जिससे वह पहले स्थान पर रहा. इसके बाद महाराष्ट्र में 80 मौतें दर्ज हुईं, जो इस सूची में दूसरे नंबर पर रहा. मध्य प्रदेश तीसरे स्थान पर रहा, जहां 50 लोगों की मौत हुई. इसके अलावा बिहार में 47 और उत्तर प्रदेश में 41 लोगों की मौत पुलिस हिरासत में हुई.

ये आंकड़े देश के विभिन्न राज्यों में पुलिस व्यवस्था और मानवाधिकारों की स्थिति पर सवाल खड़े करते हैंय हिरासत में हुई ये मौतें सिर्फ आंकड़े नहीं हैं, बल्कि वे संकेत हैं कि न्याय व्यवस्था के अंदर सुधार की कितनी जरूरत है और पुलिस की जवाबदेही को मजबूत बनाने की कितनी आवश्यकता है.

पुलिस पर क्यों लगते हैं आरोप?

कस्टोडियल डेथ के मामलों में पुलिस पर जो आरोप लगते हैं, वे बेहद गंभीर होते हैं. पूछताछ के दौरान कई बार पुलिस अत्यधिक बल प्रयोग करती है, जिससे संदिग्ध की हालत गंभीर हो जाती है. कई मामलों में कैदियों को समय पर मेडिकल सहायता नहीं दी जाती, जिससे उनकी मौत हो सकती है. बिना FIR या अदालत के आदेश के व्यक्ति को लंबे समय तक हिरासत में रखने के मामले भी सामने आते हैं, जो कि कानूनन अपराध है. कई बार पुलिस हिरासत में हुई मौत को आत्महत्या या स्वाभाविक मौत बताकर केस को दबाने की कोशिश करती है.

सरकार और न्यायपालिका की भूमिका

भारत की न्यायपालिका ने कई बार कस्टोडियल डेथ पर कड़ा रुख अपनाया है. सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट्स ने यह स्पष्ट किया है कि हिरासत में व्यक्ति के मानवाधिकारों की रक्षा करना राज्य का कर्तव्य है.  डीके बसु बनाम राज्य (1996) जैसे मामलों में सुप्रीम कोर्ट ने दिशा-निर्देश भी जारी किए, ताकि हिरासत में व्यक्ति को कानूनी सुरक्षा मिल सके.

इसके बावजूद, जमीनी हकीकत अलग है. जांच एजेंसियों की धीमी कार्यप्रणाली, पुलिस तंत्र की जवाबदेही की कमी और पीड़ित परिवारों को न्याय मिलने में देरी, इन सभी कारणों से समस्या बनी रहती है.

इसे भी पढ़ें- तिब्बत के इस लामा से खौफ खाता था चीन, फिर पूरे परिवार के साथ कर दी ऐसी हरकत