Diamond Rain: पृथ्वी पर बारिश का मतलब आमतौर पर पानी से होता है. लेकिन ब्रह्मांड में कहीं और प्रकृति काफी ज्यादा असाधारण तरीकों से काम करती है. वैज्ञानिकों का ऐसा मानना है कि नेप्चयून और यूरेनस जैसे दूर के ग्रहों पर हीरों के बारिश होती है. यहां पर पानी की बूंद के बजाय हीरे वायुमंडल से नीचे गिरते हैं. 

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इन ग्रहों पर हीरों की बारिश क्यों होती है?

यह घटना उन एक्सट्रीम कंडीशंस की वजह से होती है जिन्हें पृथ्वी पर स्वाभाविक रूप से दोहराना असंभव है. नेप्च्यून और यूरेनस के अंदर गहराई में दबाव पृथ्वी के वायुमंडल की तुलना में लाखों गुना ज्यादा होता है. इसी के साथ यहां का तापमान काफी ऊंचे स्तर तक पहुंच जाता है. इनका वायुमंडल मीथेन से भरपूर होता है. यह कार्बन और हाइड्रोजन से बना एक कंपाउंड है. इतने ज्यादा दबाव में मीथेन के अणु टूट जाते हैं जिससे कार्बनिक परमाणु हाइड्रोजन से अलग हो जाते हैं.

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कार्बन से हीरे तक 

मुक्त होने के बाद यह कार्बन परमाणु ज्यादा देर तक अलग-थलग नहीं रहते. भारी दबाव उन्हें कंप्रेस होने और  क्रिस्टलाइज होकर हीरे बनने के लिए मजबूर करता है. असल में प्रकृति वही प्रक्रिया दोहराती है जो प्रयोगशाला में इस्तेमाल होती है. यह नए बने हीरे फिर ग्रह के अंदर और गहराई में गिरने लगते हैं. इससे ऐसा लगता है कि आसमान से हीरों की बारिश हो रही है.

कीमती रत्नों की बौछार 

वैज्ञानिकों का ऐसा मानना है कि यह प्रक्रिया इन बर्फीले विशाल ग्रहों के अंदर लगातार चलती रहती है. बनने वाले हीरे पृथ्वी पर पाए जाने वाले हीरों से कहीं ज्यादा बड़े होते हैं. यह इन ग्रहों को सौरमंडल के सबसे आकर्षक और सबसे समृद्ध स्थानों में से एक बनाता है. 

क्या हीरों के बारिश कहीं और भी होती है?

रिसर्च से ऐसा पता चलता है कि शनि और बृहस्पति जैसे गैसीय विशाल ग्रहों पर भी ऐसी ही घटनाएं हो सकती हैं. इन ग्रहों पर शक्तिशाली बिजली के तूफान मीथेन को कार्बन के रूपों जैसे ग्रेफाइट में बदल सकते हैं. आखिर में हीरों में बदल सकते हैं.

वैज्ञानिकों का ऐसा भी कहना है कि इन ग्रहों के अंदर गहराई में तापमान इतना ज्यादा हो सकता है कि हीरे पिघल जाएं. इससे शायद उनके कोर के पास तरल हीरे के महासागर बन सकते हैं.

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