भारत की प्रशासनिक व्यवस्था में नियमों की जड़ें कितनी गहरी और कभी-कभी कितनी हैरान करने वाली हो सकती हैं, इसका एक दिलचस्प उदाहरण स्याही के रंग को लेकर छिड़ा विवाद है. साल 1999 में शुरू हुआ यह मामला पूरे 13 महीनों तक फाइलों में दबता और निकलता रहा. इस लंबे विवाद में देश के कई बड़े मंत्रालय और विभाग शामिल हुए, जिनका काम केवल यह तय करना था कि आखिर कौन सा सरकारी अधिकारी किस रंग की स्याही से फाइल पर हस्ताक्षर या नोटिंग करेगा. आइए इस पूरी घटना को समझते हैं. 

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दो अधिकारियों से शुरू हुआ विवाद

इस पूरे विवाद की शुरुआत साल 1999 में हुई थी. इस्पात मंत्रालय यानी मिनिस्ट्री ऑफ स्टील में तैनात दो कनिष्ठ स्तर के अधिकारियों ने अपनी फाइलों पर सामान्य नीली स्याही की जगह लाल और हरे रंग की स्याही का इस्तेमाल कर दिया. ब्रिटिश काल से चली आ रही परंपरा के अनुसार, लाल और हरे रंग की स्याही का इस्तेमाल केवल वरिष्ठ अधिकारियों के लिए आरक्षित था. ऐसे में कनिष्ठ अधिकारियों द्वारा इस रंग का इस्तेमाल करना एक बड़ी प्रशासनिक गलती माना गया. इसके बाद इसे केवल एक साधारण सुधार के रूप में नहीं लिया गया, बल्कि इस पर एक पूरी जांच और लंबी फाइल तैयार करने का निर्णय लिया गया.

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प्रशासनिक सुधार से लेकर रक्षा मंत्रालय तक पहुंचा मामला

देखते ही देखते यह छोटी सी घटना एक बड़े आधिकारिक विवाद में बदल गई. इस मामले को सुलझाने के लिए फाइलें एक मंत्रालय से दूसरे मंत्रालय भेजी जाने लगीं. इस्पात मंत्रालय से शुरू होकर यह फाइल रक्षा मंत्रालय, प्रशासनिक सुधार विभाग, मुद्रण निदेशालय, कार्मिक और प्रशिक्षण विभाग (DoPT) और यहां तक कि राष्ट्रीय अभिलेखागार तक पहुंच गई. हर विभाग को इस मामले पर अपनी राय और विशेषज्ञता देनी थी. जो मामला कुछ ही मिनटों में सुलझ सकता था, वह भारतीय नौकरशाही के जटिल गलियारों में उलझकर रह गया और महीनों तक फाइलों की आवाजाही जारी रही.

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स्याही की उम्र और इतिहास पर हुई लंबी चर्चा

इस 13 महीने के लंबे विवाद के दौरान अलग-अलग विभागों ने अपने-अपने तरीके से इस पर विचार किया. मुद्रण निदेशालय ने विभिन्न रंगों की स्याही के टिकने की क्षमता और उसकी गुणवत्ता की जांच की. राष्ट्रीय अभिलेखागार ने सरकारी दस्तावेजों को लंबे समय तक सुरक्षित रखने के दृष्टिकोण से अपनी राय दी. वहीं रक्षा मंत्रालय ने इस पर सैन्य पदानुक्रम और ऐतिहासिक परंपराओं का हवाला दिया. जब यह मामला कार्मिक और प्रशिक्षण विभाग के पास पहुंचा, तो उन्होंने फाइल पर केवल इतना लिखकर वापस भेज दिया कि यह आपकी नियमावली है, इसलिए फैसला भी आपको ही करना होगा. इसके बावजूद कोई अंतिम निर्णय तुरंत नहीं लिया जा सका.

फाइलों की उम्र बढ़ाने के लिए बने थे नियम

दरअसल, भारत की नौकरशाही में स्याही के रंगों को लेकर जो नियम बने थे, उनका सीधा संबंध ब्रिटिश काल से था. अंग्रेजों के जमाने में सरकारी फाइलों को भारत से इंग्लैंड भेजा जाता था. दस्तावेजों पर लिखी गई बातें और हस्ताक्षर लंबे समय तक सुरक्षित रहें और मिटें नहीं, इसके लिए अलग-अलग रंगों की स्याही और उनकी गुणवत्ता तय की गई थी. इसके अलावा, अंग्रेजों ने प्रशासनिक नियंत्रण और पद की पहचान बनाए रखने के लिए रंगों का एक पदानुक्रम तैयार किया था. वरिष्ठ अधिकारियों को लाल और हरी स्याही दी जाती थी, ताकि उनकी टिप्पणियां फाइल में अलग से चमकें, जबकि कनिष्ठ स्तर के बाबू केवल नीली या काली स्याही का ही इस्तेमाल कर सकते थे.

जूनियर अधिकारियों के लिए केवल नीली स्याही

पूरे 13 महीनों तक चले इस भारी-भरकम मंथन और फाइलों के आदान-प्रदान के बाद आखिरकार एक निष्कर्ष निकाला गया. इस फैसले में ब्रिटिश काल से चली आ रही उसी पुरानी प्रशासनिक व्यवस्था और पद की गरिमा को फिर से सही ठहराया गया. तय किया गया कि कनिष्ठ अधिकारी केवल नीली या नीली-काली स्याही का ही उपयोग करेंगे. इसके पीछे दस्तावेजों की लंबी उम्र का तर्क दिया गया. वहीं, दूसरी ओर वरिष्ठ अधिकारियों के लिए लाल और हरे रंग की स्याही का विशेषाधिकार पूरी तरह सुरक्षित रखा गया. इस तरह, महीनों की माथापच्ची के बाद व्यवस्था में कोई बदलाव करने के बजाय पुरानी परिपाटी को ही आगे बढ़ाया गया.

सरकारी नियमावली में हुआ बदलाव

इस लंबे विवाद के शांत होने के बाद सरकारी दफ्तरों के काम करने के तौर-तरीकों की किताब यानी 'मैनुअल ऑफ ऑफिस प्रोसीजर' में बाकायदा बदलाव किया गया. इसके पैराग्राफ 32(9) में यह स्पष्ट रूप से लिख दिया गया कि लाल और हरे रंग की स्याही का इस्तेमाल केवल संयुक्त सचिव (Joint Secretary) स्तर और उससे ऊपर के अधिकारी ही कर सकते हैं, और वे भी इसका उपयोग बेहद सीमित तरीके से करेंगे. हालांकि, इसके बाद पैराग्राफ 68(5) में एक और क्लॉज जोड़ा गया जिसमें कहा गया कि अब फाइलों को सहेजने के लिए आधुनिक तरीके आ गए हैं, इसलिए स्याही की उम्र की कोई चिंता नहीं है और किसी भी रंग का उपयोग किया जा सकता है. इस विरोधाभासी नियम के बावजूद सरकारी दफ्तरों में पुरानी आदतें वैसी ही बनी रहीं.

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