Earthquake on The Moon: धरती पर भूकंप आना तो एक आम बात है, लेकिन क्या आपने कभी सुना है कि क्या चांद पर भी भूकंप जैसी हलचल होती है? जी हां, इसे मूनक्वेक यानी चंद्र-भूकंप कहा जाता है. सबसे दिलचस्प बात यह है कि जब अपोलो मिशन के दौरान इंसान चांद पर गए और वहां उपकरण छोड़कर आए, तो वैज्ञानिकों ने पाया कि चांद पर सच में कंपन होते हैं. तो सवाल उठता है कि आखिर यह कंपन कैसे होते हैं और चांद पर रखे इंसानी उपकरणों को इनसे नुकसान क्यों नहीं पहुंचा. आइए इसे आसान भाषा में जानते हैं.
जानिए चांद पर कंपन क्यों और कैसे होता है
सन 1969 से 1977 के बीच अपोलो अंतरिक्ष यात्रियों ने चांद की सतह पर सीस्मोमीटर यानी कंपन नापने वाले यंत्र रखे थे. इन यंत्रों ने हजारों बार चांद पर हलचल दर्ज की. वैज्ञानिकों के मुताबिक इसकी कई वजहें हैं. एक तो चांद अंदर से धीरे-धीरे ठंडा होकर सिकुड़ रहा है, जिससे उसकी सतह में दरारें बनती हैं और यही दरारें अचानक हिलने से कंपन पैदा करती हैं. दूसरी वजह है धरती का गुरुत्वाकर्षण, जो चांद को अंदर से खींचता और खिंचाव पैदा करता है, जिससे गहराई में कंपन होते हैं. इसके अलावा उल्कापिंडों के टकराने से भी चांद पर हलचल होती है. अभी तक सबसे तेज चंद्र-भूकंप करीब पांच से साढ़े पांच तीव्रता के दर्ज किए गए हैं, जो धरती के बड़े भूकंपों जितने ताकतवर तो नहीं होते, लेकिन इनकी एक खास बात इन्हें अलग बनाती है. कम तीव्रता की वजह से वहां बने उपग्रह अक्सर सुरक्षित रहते हैं.
घंटों तक चलता है चांद का भूकंप, जानिए वजह
धरती पर भूकंप कुछ सेकंड या ज्यादा से ज्यादा कुछ मिनट तक चलता है, लेकिन चांद पर आने वाला कंपन घंटों तक चल सकता है, कभी-कभी तो दस मिनट से भी ज्यादा देर तक. इसकी वजह यह है कि चांद की सतह बेहद सूखी और टूटी-फूटी है, जिसमें पानी बिल्कुल नहीं होता. इस वजह से कंपन की ऊर्जा जल्दी खत्म नहीं होती, बल्कि अंदर ही अंदर घंटी की तरह गूंजती रहती है. यही वजह है कि वैज्ञानिक मानते हैं कि अगर चांद पर लंबे समय तक कोई बड़ा ढांचा या बेस बना हो, तो ऐसा लंबा कंपन उसे नुकसान पहुंचा सकता है, यहां तक कि उसे गिरा भी सकता है.
