जब लोग मुगल बादशाहों की बात सोचते हैं, तो अक्सर उनके दिमाग में आलीशान महल और बड़े-बड़े खाने की मेज आती है.  लेकिन सच्चाई यह है कि मुगल बादशाह कभी भी टेबल और कुर्सियों पर बैठकर भोजन नहीं करते थे. उनका दस्तरख्वान यानी खाने का फैला हुआ शाही कपड़ा जमीन पर ही बिछता था. इसके ऊपर गद्दे और कुशन रखे जाते थे, जिस पर बादशाह आराम से बैठकर खाना खाते थे

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दस्तरख्वान सिर्फ एक साधारण कपड़ा नहीं था. यह अक्सर रेशमी, मखमली या दमिश्क कपड़े का बना होता था. कभी-कभी इसे सोने के धागों से कढ़ाई किया जाता था. इसके नीचे मोटा कालीन बिछाया जाता था ताकि शाही भोजन और भी आरामदायक और सुरक्षित हो. मुगल बादशाह बिना  दस्तरख्वान के खाना कभी पसंद नहीं करते थे. 

मुगल रोज खाने में क्या खाते थे

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मुगल रोजाना का  खाना कई तरह के व्यंजनों से भरपूर रहता था. इसमें कोरमा, कबाब, पुलाव, रोटियां और मीठे व्यंजन, ताजे और सूखे फल, अचार, भारतीय मसाले और कभी-कभी यूरोपीय व्यंजन शामिल थे. जैसे-जैसे समय बीता, पुर्तगालियों के आने के बाद आलू और मिर्च भी शाही खाने का हिस्सा बन गए. जहांगीर और शाहजहां के काल में आलू को भी अलग-अलग तरह से पकाकर  दस्तरखान पर रखा जाता था. इसमें सबसे शानदार और विविध थाली बलिंदिर शाहजफर की मानी जाती थी.उनकी थाली में तुर्किश, अफगानी और भारतीय व्यंजन सभी मौजूद होते थे. 

कैसी थी उनकी थाली?

मुगल बादशाहों का खाना न सिर्फ टेस्ट में बल्कि दिखावट में भी बेहद खास होता था. उनकी थाली हमेशा शानदार, रंग-बिरंगी और सोने-चांदी के पत्तों से सजी रहती थी. रसोइये अपने हुनर का पूरा यूज करते थे. फलों को फूल या पत्तों के आकार में काटा जाता था. सूखे मेवे पुलाव में डालने से पहले गोंद से चमकाए जाते थे. घी को रंगा और सुगंधित किया जाता था. दही कभी-कभी सात रंगों में परोसा जाता था.

पनीर को विशेष टोकरियों में सजाया जाता था. जहांगीर के समय नूरजहां ने शाही खाने में कलात्मक सजावट का नया आयाम लाया. इसके अलावा, सम्राट के लिए रोज कई व्यंजन तैयार किए जाते थे.कुछ व्यंजन आधे पके रखे जाते थे, ताकि सम्राट मांगने पर तुरंत खा सकें. उनकी थाली में फलों और अचार का होना जरूरी थाय. ऐसा माना जाता था कि फलों से भूख बढ़ती है, पाचन बेहतर होता है और बीमारियों से बचाव होता है. 

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