Shia Population: ईरान, अमेरिका और इजरायल के बीच चल रहे संघर्ष को पूरा एक महीना हो चुका है. शनिवार को ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान ने बयान दिया कि अमेरिका इजरायल पक्ष द्वारा की गई हर कार्रवाई का ईरान पूरी ताकत से जवाब देगा. इसी बीच आइए जानते हैं कि ईरान के बाद किस देश में शिया आबादी सबसे ज्यादा है.

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दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी शिया आबादी वाला देश 

ईरान के बाद पाकिस्तान दुनिया में दूसरी सबसे बड़ी शिया आबादी वाला देश है. वर्ल्ड पॉपुलेशन रिव्यू के मुताबिक पाकिस्तान में 21.5 मिलियन शिया मुसलमान रहते हैं. ये उनकी कुल मुस्लिम आबादी का लगभग 15% से 20% हिस्सा हैं. 

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बदलते अनुमान और बढ़ती संख्याएं 

प्यू रिसर्च सेंटर जैसे संस्थानों के पुराने आंकड़ों के मुताबिक शिया आबादी लगभग 10% से 15% थी. हालांकि हाल के अनुमान जिनमें वैश्विक जनसांख्यिकी मंचों के आंकड़े भी शामिल हैं, से पता चलता है कि अब यह हिस्सा 20% के करीब हो सकता है. यह आंकड़ा आबादी में हुई बढ़ोतरी को दिखाता है.

विदेश नीति में एक नाजुक संतुलन 

अपनी बड़ी शिया आबादी के बावजूद भी पाकिस्तान इस मौजूदा संघर्ष में खुलकर ईरान का साथ नहीं दे रहा है. इसके बजाय वह अपनी कूटनीतिक स्थिति को बड़ी सावधानी से संतुलित कर रहा है. ऐसा इसलिए ताकि तनाव बढ़ने से बचा जा सके और साथ ही कई पक्षों के साथ उसके रिश्ते भी बन रहें.

निभा रहा मीडिएटर की भूमिका 

खबरों के मुताबिक पाकिस्तान ने खुद को एक मीडिएटर के तौर पर पेश किया है. यह अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत को आगे बढ़ा रहा है. रिपोर्ट्स के मुताबिक पाकिस्तान से जुड़े कूटनीतिक माध्यमों के जरिए युद्ध विराम के प्रस्तावों को आगे बढ़ाया गया है. यह इस क्षेत्र में पाकिस्तान के रणनीतिक महत्व को दिखाता है. 

इजरायल के खिलाफ कड़े शब्द

पाकिस्तान ने इजरायली कार्रवाइयों की कड़ी निंदा की है. ईरान की संप्रभुता के प्रति पाकिस्तान ने अपना समर्थन जताया है. हालांकि उसने सीधे तौर पर किसी भी सैन्य हस्तक्षेप से खुद को दूर रखा है. 

सऊदी अरब के साथ संबंध 

पाकिस्तान के सऊदी अरब के साथ रक्षा क्षेत्र में करीबी संबंध हैं. इनमें सुरक्षा समझौते भी शामिल हैं. यह स्थिति पाकिस्तान के लिए और भी ज्यादा पेचीदा हो जाती है. ऐसा इसलिए क्योंकि सऊदी अरब के ईरान के साथ ऐतिहासिक रूप से तनावपूर्ण संबंध रहे हैं. ऐसे में पाकिस्तान को काफी संभल कर कदम उठाने पड़ते हैं.

ऐसा कहा जा रहा है कि पाकिस्तान अपनी कमजोर अर्थव्यवस्था को बचाने और अपने संबंधों को संभालने के लिए जानबूझकर संघर्ष में सीधे तौर पर शामिल होने से बच रहा है.  किसी भी पक्ष के साथ खुलकर खड़े होने से उसे आर्थिक और घरेलू दोनों ही तरह की चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है.

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