Cuba Embargo: अमेरिका ने फरवरी 1962 से क्यूबा पर व्यापक आर्थिक, वित्तीय और व्यापारिक प्रतिबंध लगा रखे हैं. हालांकि प्रतिबंधों की शुरुआत 1960 में राष्ट्रपति ड्वाइट डी के समय ही हो गई थी. यह प्रतिबंध राजनीतिक, आर्थिक और वैचारिक तनावों की वजह से लगाया गया था. यह सभी तनाव फिदेल कास्त्रो की क्रांति के बाद पैदा हुए थे. इस क्रांति ने क्यूबा को एक समाजवादी देश बना दिया और उसे सोवियत संघ के खिलाफ करीब ला दिया. यह आधुनिक इतिहास में सबसे लंबे वक्त तक चलने वाले आर्थिक प्रतिबंधों में से एक है. 

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फिदेल कास्त्रो की क्रांति और राष्ट्रीयकरण 

अमेरिका और क्यूबा के बीच विवाद के जड़ें 1959 में मिलती हैं, जब फिदेल कास्त्रो ने अमेरिका समर्थित क्यूबाई तानाशाह फुल्गेन्सियो बतिस्ता को सत्ता से हटा दिया गया था. सत्ता संभालने के बाद कास्त्रो ने समाजवादी नीतियां लागू की और क्यूबा की अर्थव्यवस्था के बड़े हिस्सों का राष्ट्रीयकरण करना शुरू कर दिया. 

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जिन संपत्तियों का अधिग्रहण किया गया उनमें अमेरिकी स्वामित्व वाली तेल रिफाइनरी, चीनी मिलें, बैंक और दूसरे व्यवसाय शामिल थे. अमेरिका ने इन संपत्तियों के राष्ट्रीयकरण पर कड़ी आपत्ति जताई. खासकर इस वजह से क्योंकि अमेरिकी कंपनियों और निवेशकों को ऐसा मुआवजा नहीं दिया गया जो वाशिंगटन को स्वीकार्य हो. अमेरिकी स्वामित्व वाली संपत्ति को लेकर हुआ विवाद दोनों देशों के बीच बढ़ते आर्थिक टकराव की मुख्य वजहों में से एक बन गया.

1960 में अमेरिका की जवाबी कार्रवाई शुरू 

कास्त्रो सरकार के खिलाफ अमेरिका के पहले बड़े आर्थिक कदम 1960 में उठाए गए. राष्ट्रपति ड्वाइट डी ने क्यूबा से चीनी की खरीद कम कर दी और आखिरकार बंद कर दी. चीनी द्वीप निर्यात इनकम का एक बड़ा स्रोत थी. इसके बाद वाशिंगटन ने क्यूबा के साथ व्यापार पर और बड़े प्रतिबंध लगा दिए.

इन उपायों का मकसद कास्त्रो सरकार पर आर्थिक दबाव डालना और अमेरिकी संपत्तियों के राष्ट्रीयकरण का जवाब देना था. हालांकि यह बदलाव जल्द ही एक आर्थिक विवाद से काफी बड़ा हो गया.

राष्ट्रपति कैनेडी के तहत पूरी तरह प्रतिबंध 

3 फरवरी 1962 को राष्ट्रपति जॉन एफ कैनेडी ने प्रोक्लेमेशन  3447 जारी की. इसमें क्यूबा पर व्यापक अमेरिकी प्रतिबंध लगाए गए. इस नीति ने दोनों देशों के बीच व्यापार को बुरी तरह सीमित कर दिया. इसमें क्यूबा से इंपोर्ट और क्यूबा को एक्सपोर्ट शामिल था. हालांकि लागू नियमों के तहत भोजन और दवा जैसे कुछ सीमित छूट भी दी गई थी. 

इस चरण तक क्यूबा पूरी तरह से सोवियत प्रभाव क्षेत्र में आ चुका था. कास्त्रो सरकार में सोवियत संघ के साथ करीबी राजनीतिक, आर्थिक और सैन्य संबंध विकसित कर लिए थे. इससे क्यूबा अमेरिका के लिए शीत युद्ध का एक बड़ा चिंता का विषय बन गया. 

क्यूबा मिसाइल संकट ने टकराव को और बढ़ाया 

अक्टूबर 1962 में यह टकराव सबसे खतरनाक मोड़ पर पहुंच गया. अमेरिका के बढ़ते दबाव और संभावित सैन्य कार्रवाई के डर से क्यूबा सुरक्षा के लिए सोवियत संघ की तरफ ज्यादा झुक गया. सोवियत संघ ने चुपके से क्यूबा में परमाणु मिसाइल तैनात कर दी. इससे परमाणु हथियार अमेरिका की मुख्य भूमि के करीब आ गए. जब अमेरिका को इन मिसाइलों का पता चला तो क्यूबा मिसाइल संकट पैदा हो गया. इससे वाशिंगटन और मॉस्को परमाणु युद्ध के काफी करीब पहुंच गए. अमेरिका ने क्यूबा के चारों तरफ नौसैनिक घेराबंदी लागू की और क्यूबा सरकार पर दबाव बढ़ाया.

1991 में सोवियत संघ के पतन के बाद कब पर गहरा असर पड़ा. क्योंकि वह सोवियत आर्थिक मदद पर काफी ज्यादा निर्भर था. प्रतिबंध खत्म करने के बजाय अमेरिका ने अपने प्रतिबंधों के दायरे को और बढ़ा दिया. 

1992 के क्यूबन डेमोक्रेसी एक्ट ने क्यूबा में राजनीतिक बदलाव की कोशिश करते हुए प्रतिबंधों को और बढ़ा दिया. 4 साल बाद 1996 के हेल्म्स बर्टन एक्ट ने प्रतिबंधों को और मजबूत किया. 

ओबामा के दौर में कुछ ढील मिली 

राष्ट्रपति बराक ओबामा के कार्यकाल में एक बड़ा बदलाव आया. ओबामा ने यह माना कि दशकों के प्रतिबंध अपने राजनीतिक मकसद को हासिल करने में नाकाम रहे हैं. इसी के साथ उन्होंने एक अलग तरीका अपनाया. 

2015-16 में अमेरिका और क्यूबा ने राजनयिक संबंध बहाल किए और दूतावास फिर से खोले. वाशिंगटन ने यात्रा, वित्तीय और व्यापार से जुड़े कुछ प्रतिबंधों में ढील दी. 

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ट्रंप ने सुधारों को काफी हद तक पलट दिया 

डोनाल्ड ट्रंप के राष्ट्रपति बनने पर एक और बड़ा बदलाव आया. 2017 से शुरू करके उनके प्रशासन ने ओबामा के कई नीतिगत बदलावों को पलट दिया और क्यूबा पर प्रतिबंध और कड़े कर दिए. ट्रंप प्रशासन ने 2021 में क्यूबा को आतंकवाद को बढ़ावा देने वाले देशों की अमेरिकी सूची में फिर से शामिल कर दिया.

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