BRICS Summit 2026: दिल्ली में ब्रिक्स समिट के पहले दिन कई बैठकें और चर्चाएं हुईं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस कार्यक्रम में शामिल होने वाले नेताओं और मेहमानों के लिए डिनर भी होस्ट किया. इसी बीच ब्रिक्स और नाटो के बीच तुलना एक बार फिर से लोगों का ध्यान खींच रही है. लेकिन क्या ब्रिक्स देश असल में नाटो का मुकाबला कर सकते हैं और कौन सा गुट ज्यादा ताकतवर है? आइए जानते हैं क्या है इस सवाल का जवाब.

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नाटो और ब्रिक्स की तुलना 

नाटो और ब्रिक्स की सीधी तुलना नहीं की जा सकती क्योंकि वे मूल रूप से अलग-अलग उद्देश्यों के लिए बनाए गए हैं. नाटो एक सैन्य गठबंधन है जबकि ब्रिक्स मुख्य रूप से सहयोग, व्यापार और विकास पर केंद्रित एक आर्थिक और राजनीतिक मंच है. ब्रिक्स में कोई सामूहिक रक्षा संधि नहीं है जिसके तहत इसके सदस्यों को किसी बाहरी दुश्मनी के खिलाफ मिलकर लड़ना पड़े. इसके बावजूद भी उनकी संयुक्त आर्थिक और सैन्य क्षमताओं की तुलना करने पर एक दिलचस्प तस्वीर सामने आती है.

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नाटो और ब्रिक्स के उद्देश्य अलग-अलग 

नाटो सामूहिक रक्षा के सिद्धांत पर काम करता है जिसके तहत किसी एक सदस्य पर हमले को पूरे गठबंधन पर हमला माना जाता है. इसके सदस्यों की सैन्य योजना और कमान संरचना एकीकृत हैं. 

दूसरी तरफ ब्रिक्स सैन्य गठबंधन के रूप में काम नहीं करता है. इसके सदस्य आर्थिक, राजनीतिक और विकास से जुड़े मुद्दों पर सहयोग करते हैं. लेकिन उनकी विदेश और रक्षा नीतियां स्वतंत्र रहती हैं. इस बुनियादी अंतर की वजह से इस बात की संभावना कम है कि ब्रिक्स किसी सैन्य टकराव का जवाब एक एकजुट ताकत के रूप में दे पाएगा. 

नाटो को रक्षा बजट में बड़ा फायदा 

नाटो के सबसे बड़े फायदों में से एक उसका भारी भरकम संयुक्त रक्षा खर्च है. गठबंधन का कुल सैन्य खर्च 1.4 ट्रिलियन डॉलर से भी ज्यादा है. इसमें अकेले अमेरिका का हिस्सा लगभग 935 बिलियन डॉलर है. इसकी तुलना में ब्रिक्स देशों का संयुक्त रक्षा खर्च लगभग 480 बिलियन डॉलर आंका गया है. इसमें चीन का हिस्सा सबसे बड़ा है. यह बड़ा अंतर नाटो को एडवांस हथियार प्रणाली, खुफिया क्षमता, सैन्य बुनियादी ढांचे और वैश्विक तैनाती को बनाए रखने के लिए ज्यादा वित्तीय क्षमता देता है.

ब्रिक्स के पास ज्यादा सक्रिय सैनिक

हालांकि रक्षा खर्च में नाटो को बढ़त हासिल है लेकिन ब्रिक्स देशों के पास ज्यादा सैन्य जनशक्ति है. ब्रिक्स देशों के संयुक्त सक्रिय सैन्य कर्मियों की संख्या 5 मिलियन से ज्यादा है. इसका मुख्य कारण चीन, भारत और रूस द्वारा बनाई गई बड़ी सेना है. नाटो के 32 सदस्यों के पास कुल मिलाकर लगभग 3.3 मिलियन सक्रिय सैनिक है. 

परमाणु हथियारों के मामले में भी दोनों गुट लगभग बराबरी पर 

आंकड़ों के मुताबिक रूस, चीन और भारत के पास कुल मिलाकर 6000 से ज्यादा परमाणु हथियार हैं. वहीं नाटो के परमाणु हथियार वाले सदस्य देशों अमेरिका, फ्रांस और ब्रिटेन के पास कुल मिलाकर 5800 से ज्यादा परमाणु हथियार हैं. 

हवाई और नौसैनिक ताकत में नाटो आगे 

आधुनिक युद्ध के कई क्षेत्रों में नाटो को तकनीकी रूप से काफी ज्यादा बढ़त हासिल है. इसके सदस्य देशों के पास बड़ी संख्या में आधुनिक लड़ाकू विमान, बेहतरीन इंटेलिजेंस और सर्विलेंस नेटवर्क और शक्तिशाली एयरक्राफ्ट कैरियर बेड़े मौजूद हैं.

वहीं दूसरी तरफ ब्रिक्स देशों की जमीनी युद्ध में काफी ताकत है. चीन, रूस और भारत के पास कुल मिलाकर बड़ी संख्या में टैंक, बख्तरबंद गाड़ियां और तोपखाने सिस्टम मौजूद हैं. इस तरह नाटो को हाई एंड एयर, नौसैनिक और नेटवर्क आधारित युद्ध में बढ़त हासिल है.

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आर्थिक ताकत 

आर्थिक तुलना काफी हद तक इस बात पर निर्भर होती है कि आर्थिक ताकत को कैसे मापा जा रहा है. नॉमिनल जीडीपी के मामले में नाटो देश काफी ज्यादा मजबूत हैं जिसमें अमेरिका की आर्थिक और वित्तीय ताकत का बहुत बड़ा योगदान है. अमेरिकन डॉलर की अंतरराष्ट्रीय भूमिका भी नाटो की प्रमुख अर्थव्यवस्था को वैश्विक स्तर पर काफी प्रभाव देती है. 

हालांकि परचेसिंग पावर पैरिटी के आधार पर मापने पर ब्रिक्स को काफी बड़ा फायदा मिलता है. इस पैमाने पर ब्रिक्स देश मिलकर अर्थव्यवस्था का लगभग 40% हिस्सा बनाते हैं. ब्रिक्स के पास बहुत बड़ी आबादी और कच्चे तेल, प्राकृतिक गैस और जरूरी खनिजों का भी बड़ा भंडार है.

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