अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की चीन यात्रा ने वैश्विक राजनीति में नई हलचल पैदा कर दी है. ईरान और पश्चिम एशिया के संकट के बीच हो रहा यह दौरा केवल दो महाशक्तियों का मिलन नहीं है, बल्कि भारत के लिए एक बड़ा रणनीतिक संकेत भी है. भारत के लिए यह क्षण अत्यंत संवेदनशील है क्योंकि अमेरिका और चीन के आपसी संबंधों की गर्माहट या कड़वाहट सीधे तौर पर हमारी अर्थव्यवस्था और सुरक्षा को प्रभावित करती है. यह बहस अब तेज हो गई है कि क्या यह करीब आती दूरियां भारत के लिए कोई नया अवसर लेकर आएंगी या फिर यह हमारे क्षेत्रीय हितों के लिए एक गंभीर चेतावनी साबित होंगी.

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ईरान संकट और ट्रंप का दबाव

डोनाल्ड ट्रंप इस समय ईरान युद्ध और पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के कारण काफी दबाव में हैं. वैश्विक बाजार में तेल की कीमतें और युद्ध के फैलने का खतरा उनकी प्राथमिकता है. माना जा रहा है कि इसी दबाव के चलते ट्रंप चीन के साथ अपने रिश्तों को नया मोड़ देने की कोशिश कर रहे हैं. भारत के लिए चिंता की बात यह है कि यदि ट्रंप ने इस दबाव में आकर चीन को कोई बड़ी रणनीतिक रियायत दी, तो इसका सीधा असर भारत के प्रभाव पर पड़ सकता है.

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व्यापारिक तालमेल और भारतीय बाजार

अमेरिका और चीन भारत के सबसे बड़े व्यापारिक साझेदार हैं. यदि ट्रंप और शी जिनपिंग के बीच ‘बोर्ड ऑफ ट्रेड’ जैसा कोई नया सिस्टम बन जाता है, तो भारत के लिए बड़ी चुनौती खड़ी हो सकती है. ट्रंप पहले भी भारतीय उत्पादों पर ऊंचे टैरिफ लगाने की वकालत कर चुके हैं. ऐसे में भारत को डर है कि अमेरिका व्यापारिक लाभ के लिए चीन को व्यापार में ढील न दे दे. अगर ऐसा हुआ तो वैश्विक बाजार में भारत की व्यापारिक महत्ता कम हो सकती है और निर्यात पर बुरा असर पड़ सकता है.

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ऊर्जा सुरक्षा का महत्वपूर्ण रास्ता

भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए कच्चे तेल और गैस पर बुरी तरह निर्भर है. यह आपूर्ति स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज के जरिए होती है, जो फिलहाल युद्ध के साये में है. भारत को उम्मीद है कि ट्रंप चीन के प्रभाव का उपयोग कर ईरान युद्ध को शांत कराएंगे और इस समुद्री रास्ते की नाकेबंदी खत्म करवाएंगे. अगर ट्रंप की यात्रा से इस मार्ग पर शांति बहाल होती है, तो यह भारत की ऊर्जा सुरक्षा के लिए एक बड़ा मौका साबित होगा.

प्रतिस्पर्धा से मिलने वाला लाभ

अब तक भारत को अमेरिका और चीन के बीच जारी कड़वाहट और कॉम्पिटिशन का सीधा फायदा मिला है. जब ये दोनों देश आपस में उलझे रहते हैं, तो अमेरिका भारत को चीन के खिलाफ एक काउंटरबैलेंस के तौर पर देखता है. इसी वजह से भारत को आधुनिक तकनीक और बड़े निवेश आसानी से मिलते रहे हैं. भारत के लिए रणनीतिक रूप से यह जरूरी है कि अमेरिका और चीन के बीच एक नियंत्रित प्रतिस्पर्धा बनी रहे, ताकि भारत की अहमियत कम न हो.

ताइवान और क्षेत्रीय अखंडता का सवाल

क्षेत्रीय सुरक्षा के लिहाज से ताइवान का मुद्दा भारत के लिए भी अहम है. यदि ट्रंप ताइवान के मुद्दे पर चीन के प्रति नरम रुख अपनाते हैं, तो इससे बीजिंग की विस्तारवादी नीतियों को नई ताकत मिल सकती है. चीन का बढ़ता मनोबल भारत की अपनी सीमाओं और क्षेत्रीय अखंडता के लिए भविष्य में खतरा पैदा कर सकता है. भारत को इस बात की आशंका है कि अमेरिका और चीन के बीच की कोई भी बड़ी डील उसके पड़ोसी देशों में चीन के प्रभाव को और बढ़ा सकती है.

जी-2 की आशंका और रणनीतिक कद

जानकारों के बीच सबसे बड़ी चिंता अमेरिका और चीन के बीच G-2 जैसी किसी संभावित साझेदारी को लेकर है. अगर दुनिया की ये दो सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाएं आपस में हाथ मिलाकर वैश्विक नियम तय करने लगीं, तो भारत जैसे उभरते देशों का रणनीतिक महत्व कम हो सकता है. भारत अब तक जिस बहुध्रुवीय विश्व की बात करता रहा है, उसे इस साझेदारी से गहरा धक्का लग सकता है. इसलिए ट्रंप का यह दौरा भारत के लिए एक कूटनीतिक इम्तिहान की तरह है.

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