Naan Bread: आज नान डिनर टेबल, रेस्टोरेंट के मेन्यू और यहां तक कि ग्लोबल फ्यूजन फूड में भी काफी ज्यादा आम है. लेकिन सदियों पहले यह नरम और फूली हुई रोटी शाही शान की निशानी हुआ करती थी. इसे सिर्फ राजाओं, अमीरों और बादशाहों के लिए बनाया जाता था. शाही महलों की रसोई से लेकर सड़क किनारे के ढाबों और इंटरनेशनल रेस्टोरेंट तक आइए जानते हैं कि इसका सफर कैसा रहा.

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दिल्ली सल्तनत में शाही शुरुआत 

नान का सबसे पुराना लिखित इतिहास लगभग 1300 ईस्वी का है. इंडो फारसी कवि अमीर खुसरो, जिन्होंने अलाउद्दीन खिलजी और मोहम्मद बिन तुगलक के समय के दरबार के जीवन का वर्णन किया था, ने नान का जिक्र दरबारों में परोसी जाने वाली एक लग्जरी रोटी के रूप में किया था. उन्होंने लिखा था कि दो तरह के नान होते हैं. एक नान-ए-तनुक और एक नान-ए-तंदूरी. 

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नान-ए-तनुक एक पतली और नाजुक रोटी हुआ करती थी और नान-ए-तंदूरी मोती और फूली होती थी और इसे ओवन में पकाया जाता था. आपको बता दें कि उस समय नान आटे और यीस्ट से बनाए जाते थे, जो काफी दुर्लभ और महंगी सामग्री थी.

नान को मिले कई रूप 

नान सही मायने में मुगल साम्राज्य के दौरान ही फला-फूला. मुगल बादशाहों ने नान को एक कला का रूप दे दिया. इसे कबाब, कीमा और रिच मीट ग्रेवी के साथ परोसा जाता था. अकबर के राज के आइन-ए-अकबरी जैसे ऐतिहासिक रिकॉर्ड में नान को शाही रसोई का एक मुख्य व्यंजन बताया गया है. शाही बावर्ची खमीर उठाने और पकने की तकनीक का काफी ध्यान रखते थे और उन्हें छुपा कर रखते थे. 

तंदूर ने बदल दिया सब कुछ 

नान के इतिहास में टर्निंग पॉइंट तंदूर के इस्तेमाल से आया. यह एक मिट्टी का ओवन हुआ करता था जो काफी ज्यादा गर्मी पैदा करने में सक्षम था. तंदूर ने नान को उसकी खास स्मोकिंग खुशबू, फफोले वाली सतह और नरम अंदरूनी हिस्सा दिया. जैसे-जैसे तंदूर धीरे-धीरे महलों से निकलकर कस्बों में फैला नान शाही सीमाओं से बाहर निकलने लगा.

अमीरों से आम आदमी की थाली तक 

18 वन और 19वीं सदी तक नान ढाबों और स्थानीय भोजनालय में दिखाई देने लगा. हालांकि ब्रिटिश शासन के दौरान इसे अभी भी प्रीमियम खाना माना जाता था लेकिन धीरे-धीरे यह अमीर शहरी घरों तक पहुंच गया. 1947 के बंटवारे के बाद पंजाब और आसपास के इलाकों से आए प्रवासियों ने तंदूर बनाने की कला पूरे भारत में फैला दी. बस यहीं से नान हर जगह उपलब्ध होने लगा.

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