India Sugar Production: भारत के घरेलू बाजारों में चीनी की कीमतें पिछले कुछ समय से लगातार बढ़ रही हैं. हालिया बाजार आंकड़ों के मुताबिक केवल एक महीने के भीतर खुदरा कीमतों में 20 फीसदी तक का बड़ा उछाल देखा गया है. अगस्त के दौरान देश के रिटेल मार्केट में जो चीनी 48 रुपये प्रति किलो के आसपास बिक रही थी, उसकी कीमत बढ़कर 55 रुपये प्रति किलो को पार कर चुकी है. इस अचानक आई तेजी के बीच दिमाग में यह सवाल है कि चीनी के इस बड़े कारोबार में भारत की वास्तविक स्थिति क्या है और दुनिया में कौन सा देश चीनी उत्पादन में शीर्ष पायदान पर काबिज है.
चीनी कीमतों में रिकॉर्ड तेजी और भारत का बाजार
भारत के उपभोक्ता मामलों के विभाग की ताजा रिपोर्ट यह बताती है कि देश में चीनी की कीमतें लगातार नए रिकॉर्ड बना रही हैं. जहां पिछले साल समान अवधि में एक किलो चीनी के लिए ग्राहकों को लगभग 46 रुपये चुकाने पड़ते थे, वहीं अब यह भाव काफी ऊपर चला गया है. भारत दुनिया में चीनी की विशाल घरेलू मांग को पूरा करने वाला दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक देश है. अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आपूर्ति की स्थिति और स्थानीय उत्पादन के चक्र का सीधा असर देश की आम जनता की जेब पर दिखाई दे रहा है.
चीनी उत्पादन में कौन है नंबर वन?
दुनिया भर में होने वाले चीनी के कुल उत्पादन का लगभग 80 प्रतिशत हिस्सा गन्ने से और बचा हुआ 20 प्रतिशत हिस्सा चुकंदर से निकाला जाता है. चीनी के इस बाजार में ब्राजील का एकतरफा राज है, जो विश्व के कुल उत्पादन का लगभग 22 से 24 प्रतिशत हिस्सा अकेले पैदा करता है. वहीं 16 प्रतिशत हिस्सेदारी के साथ भारत दूसरे स्थान पर मजबूती से टिका हुआ है. इसके बाद यूरोपीय संघ तीसरे नंबर पर आता है, जहां मुख्य रूप से चुकंदर से चीनी बनाई जाती है. वहीं थाईलैंड, चीन और संयुक्त राज्य अमेरिका गन्ने के दम पर शीर्ष पांच उत्पादकों में शामिल हैं.
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ब्राजील के सिर कैसे सजा यह ताज?
ब्राजील का चीनी का सिरमौर बनना कोई अचानक हुई घटना नहीं है, बल्कि इसके पीछे 500 साल पुराना इतिहास छिपा है. साल 1516 में पुर्तगाली औपनिवेशिक शासन के दौरान यहां पहली बार गन्ना लाया गया था. पुर्तगालियों ने इसे अपनी आर्थिक और रणनीतिक ताकत बढ़ाने का मुख्य जरिया बनाया. इसके बाद में डच व्यापारियों ने पेर्नाम्बूको क्षेत्र पर अधिकार जमाकर आधुनिक तकनीकों और विशाल बागानों के जरिए इस उद्योग को नई ऊंचाइयों पर पहुंचाया. अनुकूल जलवायु और विशाल कृषि योग्य भूमि के दम पर ब्राजील धीरे-धीरे दुनिया की सबसे बड़ी शुगर फैक्ट्री में तब्दील हो गया.
क्यूबा के हाथ से कैसे फिसला 'शुगर बाउल' का ताज?
एक दौर था जब कैरेबियाई देश क्यूबा को पूरी दुनिया में 'शुगर बाउल ऑफ द वर्ल्ड' यानी विश्व का चीनी का कटोरा कहा जाता था. 1523 में स्पेनिश शासकों ने यहां गन्ने की खेती शुरू की थी. 18वीं सदी के अंत में क्यूबा ने उत्पादन क्षमता को 14,000 टन से बढ़ाकर 34,000 टन तक पहुंचा दिया था. 20वीं सदी की शुरुआत में अमेरिकी कंपनियों के भारी निवेश से यहां अत्याधुनिक शुगर मिलें लगाई गईं. हालांकि, 1959 की क्यूबा क्रांति के बाद अमेरिका के साथ बने राजनीतिक तनाव और आर्थिक प्रतिबंधों के कारण यह उद्योग पूरी तरह तबाह हो गया और क्यूबा से नंबर-1 का ताज हमेशा के लिए छिन गया.
सबसे ज्यादा चीनी की खपत किस देश में?
चीनी के उत्पादन के साथ-साथ इसके उपभोग के आंकड़े भी काफी दिलचस्प हैं. वैश्विक स्तर पर सबसे ज्यादा चीनी का सेवन संयुक्त राज्य अमेरिका के लोग करते हैं, जहां एक औसतन व्यक्ति रोजाना लगभग 126 ग्राम चीनी खाता है. अमेरिका के अलावा यूरोपीय देशों जैसे जर्मनी, नीदरलैंड्स और आयरलैंड में भी प्रति व्यक्ति चीनी की दैनिक खपत काफी अधिक दर्ज की जाती है. भारत भले ही चीनी का दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक हो, लेकिन विशाल आबादी के कारण यहां उत्पादित चीनी का अधिकांश हिस्सा घरेलू जरूरतों में ही खप जाता है.
दुनिया भर के बाजारों में चीनी के दाम
वैश्विक व्यापार आंकड़ों के अनुसार विभिन्न देशों में चीनी के खुदरा और थोक दामों में भारी अंतर देखने को मिलता है. भारत में चीनी का भाव लगभग 55 से 60 रुपये प्रति किलो के बीच है. सबसे बड़ा उत्पादक और निर्यातक होने के कारण ब्राजील और थाईलैंड में यह 0.45 से 0.60 डॉलर प्रति किलो के भाव पर उपलब्ध है. दूसरी तरफ, आयात पर निर्भरता के कारण चीन में भाव 0.65 से 0.79 डॉलर और सख्त घरेलू नीतियों व टैरिफ प्रोटेक्शन के चलते अमेरिका में चीनी 0.70 से 1.90 डॉलर प्रति किलो तक के उच्च स्तर पर बिकती है.
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