Sonam Wangchuk Hunger Strike: लद्दाख के मशहूर पर्यावरण कार्यकर्ता सोनम वांगचुक इन दिनों दिल्ली के जंतर मंतर पर अपनी मांगों को लेकर अनिश्चितकालीन अनशन पर बैठे हैं. आज उनके इस अनशन का 19वां दिन है. उनके इस कड़े कदम और गिरती सेहत ने एक बार फिर से पूरे देश का ध्यान इस तरफ खींचा है कि अपनी बात मनवाने के लिए अन्न त्यागना कितना बड़ा हथियार है. इस माहौल के बीच में यह जानना दिलचस्प है कि आखिर भूख हड़ताल की शुरुआत सबसे पहले किसने की थी और यह किसके खिलाफ थी.
कब और कहां से हुई भूख हड़ताल की शुरुआत?
भूख हड़ताल का कोई एक अकेला आविष्कारक नहीं है, क्योंकि प्राचीन काल से ही लोग अपनी बात मनवाने या फिर आत्मशुद्धि के लिए उपवास का सहारा लेते रहे हैं. लेकिन अगर आधुनिक इतिहास के पन्ने पलटें तो संगठित रूप से सबसे पहली और बड़ी भूख हड़ताल साल 1913 में ब्रिटेन में दर्ज की गई थी. उस दौर में महिलाओं को वोट देने का अधिकार नहीं था. ब्रिटिश सरकार के इसी भेदभाव वाले कानून के खिलाफ महिला मताधिकार आंदोलन (सफ्राजेट आंदोलन) की शुरुआत हुई, जिसने दुनिया को शांतिपूर्ण लेकिन कड़े विरोध का एक नया रास्ता दिखाया.
जब महिलाओं ने हिलाईं ब्रिटिश हुकूमत की जड़ें
ब्रिटेन में पुरुषों के बराबर राजनीतिक अधिकार दिलाने की इस लड़ाई का नेतृत्व मशहूर कार्यकर्ता एम्मेलिन पैन्खस्ट और उनके साथी कर रहे थे. जब ब्रिटिश सरकार ने उनकी जायज मांगों को अनसुना कर दिया, तो इन जुझारू महिलाओं ने जेल के अंदर जाकर सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया. उन्होंने जेल प्रशासन और सरकार के दमनकारी रवैये का विरोध करने के लिए खाना खाने से पूरी तरह से इनकार कर दिया. इस ऐतिहासिक कदम ने ब्रिटिश हुकूमत की जड़ें हिला दीं और दुनिया भर में महिलाओं के अधिकारों के लिए एक नई चेतना जगाई.
यह भी पढ़ें: दो दिन खाना न खाएं तो शरीर में क्या होता है, कितने दिन की एनर्जी स्टोर रखती है हमारी बॉडी?
भारत में भूख हड़ताल को किसने बनाया अचूक हथियार?
अगर हम भारत की बात करें तो यहां भूख हड़ताल को अचूक राजनैतिक हथियार बनाने का श्रेय राष्ट्रपिता महात्मा गांधी को जाता है. गांधी जी ने साल 1918 में गुजरात के अहमदाबाद में कपड़ा मिल मजदूरों के अधिकारों के लिए देश का पहला अनशन किया था. वहां के मिल मालिक मजदूरों का वेतन बढ़ाने के लिए तैयार ही नहीं थे, जिसके खिलाफ गांधी जी ने मिल मालिकों पर नैतिक दबाव बनाने के लिए अन्न-जल छोड़ दिया. उनके इस सत्याग्रह के आगे आखिरकार मिल मालिकों को झुकना पड़ा और मजदूरों को उनका हक मिला.
कैदियों के अधिकार के लिए लाहौर जेल में अनशन
भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में एक और बड़ी भूख हड़ताल साल 1929 में हुई, जब महान क्रांतिकारी भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने लाहौर जेल में ब्रिटिश सरकार के खिलाफ मोर्टा खोला. उन्होंने भारतीय कैदियों को भी ब्रिटिश कैदियों की तरह से समान सुविधाएं और सम्मानजनक व्यवहार दिलाने के लिए रिकॉर्ड 116 दिनों तक खाना नहीं खाया. इसी तरह वैश्विक स्तर पर साल 1981 में आयरलैंड की जेल में बंद बॉबी सैंड्स नामक कैदी ने ब्रिटिश सरकार से पाजनीतिक कैदी का दर्जा हासिल करने के लिए 66 दिनों तक ऐतिहासिक अनशन किया था.
यह भी पढ़ें: अनशन पर बैठे सोनम वांगचुक की मौत हो जाए तो क्या सरकार के खिलाफ हो सकता है मुकदमा, क्या ऐसा भी है कोई नियम?
