जंतर-मंतर पर भूख हड़ताल पर बैठे पर्यावरण कार्यकर्ता सोनम वांगचुक के इस विरोध प्रदर्शन को लेकर लोगों में एक सवाल उठ रहा है. सवाल यह है कि अगर किसी बड़े अनशनकारी के साथ अनहोनी हो जाती है, तो क्या कानूनी तौर पर सरकार को इसके लिए जिम्मेदार ठहराकर उस पर मुकदमा चलाया जा सकता है? भारत के संविधान और आपराधिक कानूनों में अनशन, आत्मदाह या अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल को लेकर बेहद स्पष्ट और कड़े नियम बनाए गए हैं. इस बारे में सरल शब्दों में आसानी से समझते हैं.

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क्या अनशन के दौरान मौत पर सरकार दोषी है?

भारतीय कानून व्यवस्था में किसी व्यक्ति द्वारा अपनी मांगों को लेकर स्वेच्छा से अन्न-जल का त्याग करना एक व्यक्तिगत फैसला माना जाता है. विशेषज्ञ मानते हैं कि अगर कोई नागरिक खुद से भूख हड़ताल पर बैठता है और इस दौरान उसकी मृत्यु हो जाती है तो इसके लिए सीधे तौर पर सरकार के खिलाफ हत्या या गैर-इरादतन हत्या ता मुकदमा दर्ज नहीं किया जा सकता है. ऐसा इसलिए है, क्योंकि सरकार ने उस व्यक्ति को भूखा रहने के लिए मजबूर नहीं किया होता है. लोकतांत्रिक व्यवस्था में विरोध प्रदर्शन का अधिकार तो है, लेकिन खुद के जीवन को संकट में डालने की कानूनी जवाबदेही प्रदर्शनकारी की अपनी होती है.

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अनशनकारी की हालत गंभीर होने पर क्या होता है?

अतीत में भूख हड़ताल या फिर अनशन करने वालों पर आत्महत्या के प्रयास का मुकदमा दर्ज करके उनको जेल में डाल दिया जाता था, जैसा कि इरोम शर्मिला के मामले में देखा गया था. लेकिन नए मानसिक स्वास्थ्य देखभाल अधिनियम और वर्तमान कानूनी संशोधनों के बाद अब स्थिति बदल गई है. अब कानून यह मानता है कि गंभीर तनाव या विपरीत परिस्थितियों में ही कोई व्यक्ति ऐसा कदम उठाता है. हालांकि अगर प्रशासन को लगता है कि अनशनकारी की हालत गंभीर है, तो कानूनन सरकार के पास यह अधिकार सुरक्षित होता है कि वह डॉक्टर की सलाह पर उस व्यक्ति को जबरन अस्पताल में भर्ती कराके ड्रिप चढ़ाए.

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प्रशासन की जिम्मेदारी और कोर्ट के कड़े निर्देश

भले ही सीधे तौर पर सरकार पर मुकदमा न चले, लेकिन देश की अदालतों का यह स्पष्ट मानना है कि हर नागरिक के जीवन की रक्षा करना राज्य की बुनियादी और संवैधानिक जिम्मेदारी है. यदि कोई नागरिक सार्वजनिक स्थान पर अनशन पर है, तो प्रशासन उसकी मेडिकल जांच कराने और उसकी स्थिति पर नजर रखने के लिए बाध्य होता है. लापरवाही बरतने या समय पर चिकित्सा सहायता न देने की स्थिति में मानवाधिकार आयोग या कोर्ट के जरिए प्रशासन की जवाबदेही तय की जा सकती है. 

उकसाने वालों पर क्या हो सकती है कार्रवाई?

इस मामले का एक और कानूनी पहलू यह है कि यदि कोई राजनीतिक दल, संगठन या बाहरी व्यक्ति किसी को जबरन भूख हड़ताल जारी रखने के लिए उकसाता है या चिकित्सा सहायता लेने से रोकता है तो उस पर सख्त कानूनी कार्रवाई हो सकती है. ऐसी स्थिति में उकसाने वाले लोगों या संगठन के पदाधिकारियों के खिलाफ आपराधिक षडयंत्र रचने या आत्महत्या के लिए उकसाने की धाराओं पर मुकदमा चलाया जा सकता है.

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