नाग पंचमी के करीब आते ही समाज में सांपों से जुड़ी कई पुरानी कहानियां और अजीबोगरीब धारणाएं फिर से सामने आने लगती हैं. सबसे प्रचलित भ्रम तो यह है कि सांप बड़े चाव से कटोरी भरकर दूध पीते हैं. इसके अलावा जोड़ीदार की मौत पर बदला लेने जैसी बातें भी खूब फैलाई गई हैं. हालांकि विज्ञान इन सभी बातों का सिरे से खंडन करता है और उनको पूरी तरह से काल्पनिक मानता है. अब सोचने की बात यह है कि जब सांप को दूध पिलाना जैसी बात सही नहीं है, फिर यह कहावत समाज में कहां से आई.

क्या है सांप को दूध पिलाना कहावत का अर्थ?

सांप को दूध पिलाना एक प्रसिद्ध मुहावरा है, जिसका असल अर्थ किसी दुष्ट व्यक्ति का पालन-पोषण करना या फिर दुश्मन का भला करना होता है. जिस तरीके से दूध पीने के बावजूद सांप का जहरीला या हिंसक स्वभाव नहीं बदलता है और मौका मिलने पर वह डस ही लेता है, ठीक उसी तरह किसी बुरे इंसान की मदद करने पर अंत में नुकसान ही उठाना पड़ता है.

सांप के दूध न पचा पाने का वैज्ञानिक कारण

विज्ञान के अनुसार सांप सरीसृप प्रजाति का एक जीव है न कि वह स्तनधारी है. इसका सीधा अर्थ यह है कि उनके शरीर में मौजूद लैक्टोज को पचाने के लिए जरूरी एंजाइम या पाचक रस बनते ही नहीं हैं. सांप शत प्रतिशत मांसाहारी होते है, जो केवल चूहे, मेढ़क और कीड़े-मकोड़े खाकर पेट भरते हैं. उनका पाचन तंत्र ठोस मांसाहारी भोजन को पचाने के लिए बना ही नहीं है. जब सांप के पेट में दूध जाता है तो उसे भयंकर अपच, संक्रमण, पेट फूलना और निमोनिया जैसी जानलेवा बीमारियां होती हैं, जिससे उसकी तड़पकर मौत हो जाती है.

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कैसे फैला सांप को दूध पिलाने वाली लोककथा का भ्रम?

यह अंधविश्वास मुख्य रूप से सपेरों की क्रूरता और लोककथाओं की वजह से फैला है. नाग पंचमी से कई हफ्ते पहले सपेरे सांपों को जंगलों से पकड़कर अंधेरे डिब्बों में बंद कर देते हैं और उनको भूखा-प्यासा रखते हैं. भयानक प्यास से परेशान सांप के सामने जब दूध की कटोरी रखी जाती है, तो वह जिंदा रहने के लिए किसी भी तरल पदार्थ को पानी समझकर पी जाता है. इसके अलावा ग्रामीण क्षेत्रों में यह अफवाह भी फैला दी गई कि धामिन सांप गायों का दूध पीता है, जबकि सच्चाई यह है कि वह गाय के तबेले में सिर्फ चूहों का शिकार करने पहुंचता है. 

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