National Emergency India: 1975 में लगाया गया आपातकाल भारत के संवैधानिक इतिहास के सबसे विवादित अध्यायों में से एक है. इस वक्त भी देश का माहौल थोड़ा गर्मा गर्मी में चल रहा है. दिल्ली में कॉकरोच जनता पार्टी का आंदोलन काफी बड़ा हो चुका है. वैसे तो आज के कानूनी ढांचे के तहत ऐसे आपातकाल को दोहराना अब उतना आसान नहीं है जितना उस वक्त था. 1978 के 44वें संवैधानिक संशोधन के बाद, आपातकालीन प्रावधानों के गलत इस्तेमाल को रोकने के लिए कई संवैधानिक सुरक्षा उपाय पेश किए गए. यही वजह है कि आज राष्ट्रीय आपातकाल की घोषणा करना कानूनी और राजनीतिक रूप से 1975 की तुलना में काफी ज्यादा मुश्किल हो गया है. 

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सबसे बड़ा बदलाव 

आपातकाल के बाद शुरू किए गए सबसे जरूरी परिवर्तनों में से एक संविधान से आंतरिक गड़बड़ी वाक्यांश को हटाना था. 1975 में इसी आधार पर आपातकाल की घोषणा की गई थी, जिसे व्यापक और व्याख्या के लिए खुला माना गया. 44वें संवैधानिक संशोधन ने इस अभिव्यक्ति को सशस्त्र विद्रोह से बदल दिया. इसका मतलब यह है कि अब सिर्फ राजनीतिक अशांति या फिर व्यापक विरोध प्रदर्शन की वजह से राष्ट्रीय आपातकाल घोषित नहीं किया जा सकता. अब इसके लिए राज्य के विरुद्ध एक गंभीर सशस्त्र विद्रोह की जरूरत है, जिससे कानूनी सीमा काफी ज्यादा हो जाए. 

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अब प्रधानमंत्री अकेले फैसले नहीं ले सकते 

1975 के बाद शुरू की गई एक और प्रमुख सुरक्षा सरकार के अंदर फैसले लेने की प्रक्रिया से जुड़ी है. इंदिरा गांधी सरकार द्वारा लगाए गए आपातकाल के दौरान पूरे मंत्रिमंडल की औपचारिक लिखित सिफारिश के बिना राष्ट्रपति को एक पत्र के बाद उद्धोषणा जारी की गई थी. 

वर्तमान संवैधानिक ढांचे के तहत राष्ट्रपति केंद्रीय मंत्रिमंडल से लिखित सिफारिश प्राप्त करने के बाद ही राष्ट्रीय आपातकाल की घोषणा कर सकते हैं. इससे यह पक्का होता है कि इस तरह का फैसला प्रधानमंत्री द्वारा एक तरफा नहीं लिया जा सकता. 

संसद को इसे विशेष बहुमत से अनुमोदित करना होगा 

आपातकाल घोषित होने के बाद भी यह अपने आप से लागू नहीं रह सकता. संविधान में अब यह जरूरी है कि प्रोक्लेमेशन को 30 दिनों के अंदर लोकसभा और राज्यसभा दोनों में अनुमोदित किया जाए. इससे भी जरूरी बात यह है कि अनुमोदन को जरूरी संवैधानिक शर्तों के तहत खास बहुमत के जरिए से सुरक्षित किया जाना चाहिए. इसका मतलब है उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों का दो तिहाई बहुमत. इससे किसी भी सरकार के लिए संसदीय समर्थन के बिना आपातकाल जारी रखना काफी मुश्किल हो जाता है. 

न्यायालय सरकार के फैसलों की समीक्षा कर सकते हैं 

1975 के आपातकाल के उलट न्यायपालिका अब आपातकालीन प्रोक्लेमेशन की वैधता की जांच करने में काफी ज्यादा मजबूत भूमिका निभाती है. सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के पास न्यायिक समीक्षा की शक्ति है. यह उन्हें इस बात को जांचने में सक्षम बनाती हैं कि आपातकाल लगाने के लिए संवैधानिक जरूरतें वास्तव में पूरी हुई हैं या फिर नहीं. अगर अदालत यह फैसला निकालती हैं कि निर्णय मनमाने ढंग से फिर गलत इरादे से लिया गया था तो वह इसे रद्द कर सकते हैं. 

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मौलिक अधिकारों को ज्यादा सुरक्षा मिले

1975 के आपातकाल के अनुभव से नागरिकों के अधिकारों के  लिए मजबूत संवैधानिक संरक्षण भी प्राप्त हुआ. आज संविधान के अनुच्छेद 20 और 21 जो पूर्व व्यक्ति आपराधिक दंड से रक्षा करते हैं और जीवन के व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार की गारंटी देते हैं को राष्ट्रीय आपातकाल के दौरान भी निलंबित नहीं किया जा सकता. यह सुरक्षा इस बात को पक्का करती हैं कि चाहे जो भी हो हर नागरिक को कुछ बुनियादी संवैधानिक सुरक्षाएं जरूर मिलें.

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