Super El Nino: वैज्ञानिकों ने एक गंभीर चेतावनी जारी की है. भारत को इस साल सुपर एल नीनो का सामना करना पड़ सकता है. इससे काफी ज्यादा गर्मी, कमजोर मानसून और सूखे जैसी स्थितियों का खतरा बढ़ जाएगा. पिछली बार जब देश में ऐसी शक्तिशाली जलवायु घटना हुई थी तब 2015-16 का समय था. उस दौरान बारिश काफी कम हुई थी, फसलों को नुकसान पहुंचा था और कई इलाकों में तापमान तेजी से बढ़ा था. अब जब विश्व मौसम विज्ञान संगठन जैसी वैश्विक एजेंसियों ने नई चेतावनी जारी की हैं तब उस संकट के दुबारा लौटने की चिंता बढ़ चुकी है.

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क्या है सुपर एल नीनो? 

सुपर एल नीनो असल में एल नीनो जलवायु घटना का ही ज्यादा तीव्र रूप है. इसमें प्रशांत महासागर की सतह का तापमान सामान्य से काफी ज्यादा बढ़ जाता है. यह 2 डिग्री सेल्सियस से भी ज्यादा बढ़ जाता है. यह बढ़ती गर्मी वैश्विक मौसम प्रणालियों को बिगाड़ देती है. सामान्य एल नीनो घटनाओं के उलट सुपर एल नीनो काफी कम होता है और कहीं ज्यादा विनाशकारी होता है.

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भारत ने पिछली बार इसका सामना कब किया था?

भारत ने पिछली बार एक बड़े से सुपर एल नीनो का सामना 2015-16 के दौरान किया था. यह आधुनिक इतिहास की सबसे शक्तिशाली घटनाओं में से एक थी. उस साल बारिश सामान्य से काफी कम हुई थी. इसी के साथ जल संसाधनों पर दबाव बढ़ा था और कई राज्यों में खेती-बाड़ी पर काफी बुरा असर पड़ा था. 

इससे भी पहले 1997-1998 की घटना ने दुनिया भर में मानसून को प्रभावित किया था. वहीं 1877-78 के सुपर एल नीनो ने भारत में एक भयानक महा अकाल ला दिया था. इससे लाखों लोगों की जान चली गई थी. यह इतिहास की सबसे बुरी जलवायु आपदाओं में से एक बन गया था. 

2026 में क्या हो सकता है? 

ऐसा कहा जा रहा है कि मई से जुलाई के बीच एल नीनो जैसी स्थितियां बनने की 61% से 80% संभावना है. बारिश घटकर सामान्य स्तर के लगभग 92% तक रह सकती है. कागज पर यह कमी भले ही छोटी लगे लेकिन असल दुनिया में इसके काफी बड़े और गंभीर परिणाम हो सकते हैं.

यह घटना इतनी खतरनाक क्यों है? 

सुपर एल नीनो को खासतौर से चिंताजनक बनाने वाली बात इसका चेन रिएक्शन है. यह सिर्फ गर्मी ही नहीं लाता बल्कि बारिश को भी बाधित करता है. इसी के साथ इस दौरान फसल उत्पादन में कमी आ जाती है और जल संसाधनों पर दबाव पड़ता है. ऐतिहासिक रूप से कुछ गंभीर मामलों में इसने अकाल जैसी स्थिति पैदा कर दी है.

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