रमजान का महीना शुरू होते ही बाजारों में रौनक बढ़ जाती है, मस्जिदों में भीड़ उमड़ती है और इफ्तार की खुशबू हर गली में फैल जाती है, लेकिन जरा सोचिए, जब हिंदुस्तान पर मुगलों का शासन था तब रमजान कैसा होता होगा? क्या बादशाह भी आम लोगों की तरह रोजा रखते थे? क्या शाही महलों में इबादत का वही सुकून होता था या वहां सिर्फ शानो-शौकत दिखती थी? इतिहास के पन्ने इन सवालों के दिलचस्प जवाब देते हैं. 

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शाही दौर में रमजान की रौनक

मुगल काल में रमजान सिर्फ एक धार्मिक महीना नहीं, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन का भी अहम हिस्सा था. शाही दरबार में इस महीने का खास सम्मान होता था. महलों में रोशनी की सजावट की जाती, मस्जिदों में कुरान खानी होती और गरीबों के लिए बड़े पैमाने पर दान की व्यवस्था की जाती थी. उस वक्त रोजा खोलने का समय होते ही शहर को इशारा देने के लिए तोप दागी जाती थी. इससे पूरे शहर को एक साथ इफ्तार का वक्त पता चलता था. कहा जाता है कि रमजान की शुरुआत पर 11 तोपों की सलामी दी जाती थी, जिससे पवित्र महीने का स्वागत किया जाता था. 

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मुगल दौर के आखिरी समय में रमजान के आखिरी जुमे, जिसे अलविदा की नमाज कहा जाता है, के मौके पर लाल किले से जामा मस्जिद तक जुलूस निकाला जाता था. यह सिर्फ धार्मिक नहीं, बल्कि सामाजिक एकता का प्रतीक भी माना जाता था. 

शाही इफ्तार और सामाजिक बराबरी

मुगल बादशाह इफ्तार के दौरान भव्य दावतें देते थे, लेकिन उनका उद्देश्य सिर्फ शान दिखाना नहीं होता था, बल्कि यह सुनिश्चित किया जाता था कि कोई गरीब भूखा न रहे. शाही रसोई में सहरी और इफ्तार के लिए अलग-अलग पकवान तैयार होते थे- रोटियां, सब्जियां, कबाब, मिठाइयां और तरह-तरह के शरबत बनते थे. इतिहासकारों की मानें तो इन दावतों में आम लोग, दरबारी, सैनिक और जरूरतमंद सभी शामिल होते थे. इसे सामाजिक बराबरी का उदाहरण माना जाता है, जहां अमीर और गरीब एक साथ बैठकर रोजा खोलते थे. 

बाबर का इफ्तार

मुगल सल्तनत के संस्थापक बाबर ने अपनी आत्मकथा ‘बाबरनामा’ में धार्मिक अनुशासन का जिक्र किया है. मध्य एशियाई परंपराओं में पला-बढ़ा बाबर रमजान के दौरान रोजे रखता था और युद्ध के बीच भी नमाज के लिए समय निकालता था. उनका इफ्तार सादा होता था. वो सैनिकों को भी अनुशासन और धार्मिक कर्तव्यों के पालन के लिए प्रेरित करता था. गरीबों में भोजन और धन बांटना उसकी आदतों में शामिल था.

इबादत में समय बिताता था हुमायूं

हुमायूं को ज्योतिष और सूफी विचारों में दिलचस्पी थी. रमजान में वह दरबार के औपचारिक कार्यक्रम कम कर देता था, ताकि ज्यादा समय इबादत में बिताया जा सके. वह खुद कुरान की तिलावत करता और उलेमा से धार्मिक चर्चा करता था. सूफी संतों की खानकाहों में चिराग जलवाना और विशेष दावतों का आयोजन करना उसके दौर की खास बात थी. 

कैसा होता था अकबर का रमजान?

अकबर का रवैया रमजान के दौरान भी व्यापक और उदार था. वह अपने जीवन के मध्य काल में रोजे रखते थे और महल में शोर-शराबा कम करने का आदेश देते थे ताकि माहौल शांत रहे. अकबर बड़े पैमाने पर खैरात बांटते थे. हजारों लोगों को भोजन और वस्त्र दिए जाते थे. फतेहपुर सीकरी की मस्जिदों में विशेष इबादत का क्रम चलता था. वह गरीबों और यात्रियों की मदद के लिए अनाज और धन वितरित करवाते थे. 

शराब से दूर हो जाता था जहांगीर

जहांगीर का नाम कला और विलासिता से जुड़ा है, लेकिन रमजान में वह भी अनुशासन का पालन करता था. अपनी आत्मकथा ‘तुजुक-ए-जहांगीरी’ में उसने लिखा है कि वह इस महीने शराब से पूरी तरह दूरी बना लेता था. महल में संगीत और मनोरंजन के कार्यक्रम रोक दिए जाते थे. इफ्तार में खजूर, शरबत, फल और हल्का भोजन परोसा जाता था. वह उलेमा से सलाह लेते और धार्मिक माहौल बनाए रखते थे. 

शाहजहां की शान और दान

शाहजहां के दौर में शाही संस्कृति अपने चरम पर थी. रमजान में भी इसकी झलक दिखती थी. जामा मस्जिद के निर्माण के बाद वहां विशेष इबादत का महत्व बढ़ गया. शाहजहां खुद रोजे रखता थे और गरीबों में अनाज, वस्त्र और चांदी के सिक्के बंटवाता था. शब-ए-कद्र की रात रोशनी और दुआओं का विशेष आयोजन होता था. हालांकि इफ्तार की दावतें भव्य होती थीं, लेकिन वह खुद सादा भोजन पसंद करता था.

औरंगजेब की सादगी

औरंगजेब को सबसे सख्त धार्मिक शासकों में गिना जाता है. रमजान में वह पूरे महीने रोजे रखता और लंबी नमाज अदा करता था. दरबार का काम सीमित कर दिया जाता था. कहते हैं कि उसने कुरान की नकल खुद लिखकर बेची और उससे मिली रकम दान में दी थी. उसका इफ्तार बेहद सादा होता- खजूर, रोटी, दाल और कभी-कभी हल्का मांसाहार. संगीत और उत्सव लगभग बंद रहते थे.

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