मध्य पूर्व में हालात तेजी से बदल रहे हैं. अरब सागर में अमेरिकी युद्धपोत, फाइटर जेट और मिसाइल सिस्टम तैनात हैं. वॉशिंगटन से सख्त बयान आ रहे हैं और तेहरान भी पीछे हटने को तैयार नहीं दिख रहा है. ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि अगर अमेरिका ने हमला किया तो क्या ईरान अकेला पड़ेगा, या उसके पास ऐसे दोस्त हैं जो मुश्किल वक्त में उसके साथ खड़े होंगे? आइए समझें.

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बढ़ती सैन्य हलचल और बड़ा सवाल

अमेरिका ने क्षेत्र में अपनी सैन्य मौजूदगी बढ़ा दी है. एयरक्राफ्ट कैरियर, मिसाइल डेस्ट्रॉयर और उन्नत डिफेंस सिस्टम जैसे THAAD तैनात किए गए हैं. यह तैयारी लंबी दूरी से सटीक हमले की क्षमता दिखाती है. लेकिन किसी भी संभावित टकराव में सिर्फ हथियार ही नहीं, साथ खड़े होने वाले देश और समूह भी अहम होते हैं. ईरान के मामले में यह साथ पारंपरिक सैन्य गठबंधन जैसा नहीं, बल्कि एक नेटवर्क की तरह है. 

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‘एक्सिस ऑफ रेजिस्टेंस’ क्या है?

ईरान का सबसे बड़ा सहारा उसका क्षेत्रीय नेटवर्क है, जिसे अक्सर Axis of Resistance कहा जाता है. इसमें सीधे-सीधे बड़े देश शामिल नहीं, बल्कि ऐसे संगठन और मिलिशिया हैं जो ईरान के करीबी माने जाते हैं. सबसे प्रमुख नाम है लेबनान का हिजबुल्लाह. यह संगठन इजराइल के खिलाफ अपनी मिसाइल क्षमता के लिए जाना जाता है और इसे ईरान का सबसे मजबूत क्षेत्रीय सहयोगी माना जाता है.

यमन में सक्रिय Houthis भी ईरान समर्थक माने जाते हैं. इनकी क्षमता लाल सागर और आसपास के समुद्री मार्गों को प्रभावित करने की है. 

इसी तरह इराक में कई शिया मिलिशिया समूह हैं, जिन्हें सामूहिक रूप से पॉपुलर मोबिलाइजेशन फोर्स कहा जाता है. ये समूह पहले भी इराक और सीरिया में अमेरिकी ठिकानों को निशाना बना चुके हैं. किसी बड़े टकराव की स्थिति में ये सक्रिय हो सकते हैं. 

सीरिया की भूमिका

सीरिया के राष्ट्रपति Bashar al-Assad का शासन लंबे समय से ईरान के साथ जुड़ा रहा है. हालांकि गृहयुद्ध के बाद सीरिया की सैन्य ताकत पहले जैसी नहीं रही, फिर भी रणनीतिक सहयोग के स्तर पर दोनों देशों के रिश्ते बने हुए हैं. सीरिया सीधा बड़ा सैन्य समर्थन दे पाएगा या नहीं, यह स्पष्ट नहीं है, लेकिन राजनीतिक समर्थन की संभावना रहती है. 

रूस और चीन का रुख

वैश्विक स्तर पर ईरान को दो बड़े देशों का सहारा मिलता है, पहला है रूस और दूसरा चीन. रूस ने पिछले वर्षों में ईरान को सैन्य तकनीक और कूटनीतिक समर्थन दिया है. संयुक्त राष्ट्र जैसे मंचों पर भी रूस ने कई बार अमेरिकी दबाव के खिलाफ ईरान का साथ दिया है.

चीन आर्थिक रूप से ईरान के लिए अहम है. वह ईरानी तेल का बड़ा खरीदार है और पश्चिमी प्रतिबंधों के बीच तेहरान के लिए आर्थिक जीवनरेखा जैसा काम करता है. हालांकि, यह भी सच है कि रूस और चीन सीधे सैन्य टकराव में कूदेंगे या नहीं, यह परिस्थितियों पर निर्भर करेगा. 

पाकिस्तान और खाड़ी देशों की स्थिति

पाकिस्तान के ईरान से रिश्ते जटिल, लेकिन संवाद आधारित रहे हैं. पाकिस्तान अक्सर क्षेत्रीय तनाव में मध्यस्थ की भूमिका निभाने की कोशिश करता है. 

वहीं दूसरी ओर, खाड़ी देश जैसे सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात, ईरान के पारंपरिक प्रतिद्वंद्वी रहे हैं. हालांकि हाल के वर्षों में तनाव कम करने की कोशिशें भी हुई हैं. ये देश खुलकर ईरान के साथ खड़े होंगे, इसकी संभावना कम मानी जाती है, लेकिन वे अपने इलाके को सीधे युद्ध का मैदान बनने से भी बचाना चाहेंगे. 

क्या ईरान सच में अकेला है?

अगर सिर्फ पारंपरिक सैन्य गठबंधन की बात करें तो ईरान के पास नाटो जैसा कोई औपचारिक सुरक्षा समझौता नहीं है, लेकिन उसके पास क्षेत्रीय नेटवर्क, मिलिशिया समूह और वैश्विक कूटनीतिक समर्थन का एक ढांचा जरूर है. संभावित संघर्ष की स्थिति में यह नेटवर्क अमेरिकी ठिकानों, समुद्री मार्गों और सहयोगी देशों पर दबाव बना सकता है. यानी लड़ाई सिर्फ दो देशों के बीच सीमित नहीं रह सकती, बल्कि पूरे क्षेत्र में फैल सकती है.

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