ईरान में सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई के खिलाफ विरोध प्रदर्शन और उग्र हो गए हैं. राजधानी तेहरान में हालात बेहद तनावपूर्ण हैं, जहां कई सरकारी दफ्तरों पर हमले, आगजनी और तोड़फोड़ की घटनाएं सामने आई हैं. सैनिकों और प्रदर्शनकारियों के बीच झड़पें हुई हैं. आधी रात के बाद विद्रोहियों ने कुछ सरकारी इमारतों पर कब्जा कर लिया. सड़कों पर शेर-सूर्य का झंडा लहराया जा रहा है और शाह अमर रहें के नारे गूंज रहे हैं. हालात काबू में रखने के लिए इंटरनेट बंद कर सुरक्षा बलों की भारी तैनाती की गई है. आइए इसी क्रम में जानते हैं कि ईरान से मुगल बादशाह क्या क्या मंगवाते थे और इसमें कितना खर्चा आता था.

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मुगल और ईरान का रिश्ता क्यों था खास?

मुगल साम्राज्य और ईरान के बीच संबंध सिर्फ कारोबारी नहीं थे, बल्कि राजनीतिक और सांस्कृतिक भी थे. बाबर मध्य एशिया की परंपराओं से आए थे, जहां फारसी संस्कृति का गहरा असर था. हुमायूं को सत्ता संघर्ष के दौरान ईरान के शाह से मदद मिली थी. इसी वजह से मुगल दरबार में फारसी भाषा, कला और जीवनशैली को खास महत्व मिला. धीरे-धीरे ईरान मुगल शाही जरूरतों का बड़ा स्रोत बन गया.

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मुगलों के शाही ईरानी शौक

ईरान की शराब उस दौर में अपनी गुणवत्ता के लिए मशहूर थी. खास तौर पर बादशाह जहांगीर को फारसी शराब और अफीम का शौकीन माना जाता है. दरबार में इसे सिर्फ नशे की चीज नहीं, बल्कि रुतबे और विदेशी संस्कृति से जुड़ाव का प्रतीक माना जाता था. लंबी दूरी, सुरक्षा और खास पैकिंग के कारण यह शराब बेहद महंगी पड़ती थी, जिसे सिर्फ शाही खजाना ही वहन कर सकता था.

अफीम शौक और दवा दोनों

बाबर से लेकर जहांगीर तक कई मुगल शासक अफीम का इस्तेमाल करते थे. उस दौर में इसे सीमित मात्रा में दवा और आराम देने वाले पदार्थ के तौर पर भी देखा जाता था. अच्छी गुणवत्ता की अफीम ईरान और मध्य एशिया से आती थी. इसे ऊंटों और कारवां के जरिए भारत लाया जाता था, जिसमें महीनों लग जाते थे. रास्ते का खर्च, सुरक्षा और कर-सब मिलाकर यह भी महंगा आयात माना जाता था.

रेशम और कालीन

फारसी रेशम और कालीन मुगल दरबार की शान थे. ईरान के कालीन अपनी बारीक कारीगरी, रंगों और डिजाइन के लिए दुनिया भर में मशहूर थे. इन्हें महलों, दरबारों और खास मेहमानों के स्वागत में इस्तेमाल किया जाता था. रेशमी कपड़े शाही पोशाकों और उपहारों के लिए मंगवाए जाते थे. ये चीजें न सिर्फ सुंदर थीं, बल्कि शक्ति और समृद्धि का प्रदर्शन भी करती थीं.

कला, कवि और विद्वान भी आते थे ईरान से

ईरान से सिर्फ सामान ही नहीं, लोग भी आते थे. फारसी कवि, चित्रकार, संगीतकार और प्रशासक मुगल दरबार का अहम हिस्सा बने. इससे मुगल कला और साहित्य पर गहरा फारसी असर पड़ा. मिनिएचर पेंटिंग, शायरी और इतिहास लेखन में यह प्रभाव साफ दिखता है. अकबर के दरबार में हाकिम हमाम जैसे ईरानी चिकित्सक भी थे, जो यूनानी चिकित्सा पद्धति के जानकार थे.

फल, मेवे और घोड़े भी थे खास आयात

मुगल बादशाह ईरान और आसपास के इलाकों से अंगूर, सेब, बादाम, पिस्ता जैसे फल और मेवे भी मंगवाते थे, जो भारत में दुर्लभ माने जाते थे. इसके अलावा ऊंची नस्ल के घोड़े भी ईरान और मध्य एशिया से आते थे, जो सेना और शाही सवारी दोनों के लिए जरूरी थे. घोड़ों का आयात खास तौर पर रणनीतिक और प्रतिष्ठा से जुड़ा हुआ था.

कितना आता था खर्च?

उस दौर के सटीक आर्थिक आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं, इसलिए यह कहना मुश्किल है कि हर साल कितना खर्च होता था, लेकिन इतिहासकार मानते हैं कि इन वस्तुओं की दुर्लभता, लंबी दूरी की यात्रा, व्यापारियों की फीस, सुरक्षा खर्च और रास्ते के करों के कारण यह एक बेहद महंगा सौदा होता था. यह सारा खर्च शाही खजाने से किया जाता था, जिसकी आय कृषि कर और व्यापार से आती थी.

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