बिहार की राजनीति में अपने बड़बोले बयान और मोकामा से बाहुबली नेता की छवि रखने वाले अनंत सिंह को जेडीयू ने 6 साल के लिए निष्कासित कर दिया है. उनकी विधायकी समाप्त करने की सिफारिश के बाद अब सबसे बड़ा सवाल उनके वित्तीय अधिकारों को लेकर उठ रहा है. मोकामा क्षेत्र में अपनी धाक रखने वाले अनंत सिंह के लिए यह फैसला बेहद अप्रत्याशित रहा. सत्ताधारी दल की इस कड़ी कार्रवाई के बीच हर कोई यह जानना चाहता है कि एक विधायक के तौर पर उन्हें हर महीने कितनी तनख्वाह मिलती थी और क्या विधायकी जाने के बाद उन्हें सरकारी पेंशन का लाभ मिलता रहेगा.
बिहार के विधायकों का मासिक वेतन
बिहार में किसी भी विधायक को मिलने वाला मानदेय केवल वेतन तक सीमित नहीं होता, बल्कि उसमें कई प्रकार के भत्ते शामिल होते हैं. एक जनप्रतिनिधि को हर महीने लगभग 1.40 लाख से 1.60 लाख रुपये तक की कुल राशि मिलती है. इसमें मूल वेतन 50,000 रुपये निर्धारित होता है. इसके अलावा, क्षेत्र के कामकाज और जनता से जुड़े रहने के लिए 55,000 रुपये का क्षेत्रीय भत्ता दिया जाता है. जनप्रतिनिधि के व्यक्तिगत सहायक के लिए 40,000 रुपये और कार्यालय के कागजी कामकाज के लिए 15,000 रुपये का स्टेशनरी भत्ता भी इस पैकेज का हिस्सा होता है.
सत्र के दौरान मिलने वाली अतिरिक्त सरकारी सुविधाएं
मासिक वेतन और भत्तों के अलावा विधायकों को कई अन्य विशेष वित्तीय सुविधाएं भी दी जाती हैं. जब भी विधानसभा का सत्र चलता है या कोई आधिकारिक बैठक होती है, तब विधायकों को 3,000 रुपये प्रतिदिन का दैनिक भत्ता अलग से मिलता है. इसके अलावा, राज्य भर में यात्रा करने के लिए मुफ्त रेल और हवाई यात्रा कूपन की सुविधा भी मिलती है. अनंत सिंह को भी अपने लंबे राजनीतिक कार्यकाल के दौरान इन सभी सुविधाओं और भत्तों का पूरा लाभ मिलता रहा है, जिससे उनका पूरा मासिक पैकेज काफी बड़ा हो जाता था.
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पूर्व विधायक पेंशन का गणित और नियम
बिहार विधानमंडल के नियमों के अनुसार, पद से हटने के बाद पूर्व विधायकों को आजीवन पेंशन पाने का अधिकार होता है. पेंशन की गणना के लिए एक खास फॉर्मूला तय किया गया है. नियमावली के तहत पहले कार्यकाल के लिए न्यूनतम मूल पेंशन 45,000 रुपये प्रति माह तय की गई है. इसके बाद विधायक जितने ज्यादा साल सदन का सदस्य रहता है, उसकी पेंशन में प्रति वर्ष 4,000 रुपये की अतिरिक्त बढ़ोतरी होती जाती है. यह नियम पूर्व विधायकों को उनके कार्यकाल के आधार पर वित्तीय सुरक्षा प्रदान करता है.
अनंत सिंह को मिलने वाली संभावित पेंशन राशि
अनंत सिंह का राजनीतिक सफर काफी लंबा रहा है. वे साल 2005 से 2022 तक अलग-अलग कार्यकालों में लगभग 17 वर्षों तक बिहार विधानसभा के सदस्य रहे हैं. यदि पेंशन फॉर्मूले के हिसाब से गणना की जाए, तो उनकी मूल पेंशन 45,000 रुपये में अतिरिक्त वर्षों के हिसाब से हर साल 4,000 रुपये की दर से बढ़ोतरी होगी. इस गणित के मुताबिक, विधायकी खत्म होने के बाद भी अनंत सिंह को पूर्व विधायक के तौर पर हर महीने 1 लाख रुपये से भी अधिक की भारी-भरकम पेंशन पाने का कानूनी अधिकार बनता है.
विधायकी छिनने के बाद पेंशन पर प्रभाव
कानूनी और प्रशासनिक नियमों के अनुसार, पार्टी से निष्कासित होने या विधायकी छिन जाने के बाद भी पेंशन पर कोई रोक नहीं लगती है. बिहार विधान मंडल नियमावली में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है जो किसी आपराधिक मामले में सजा मिलने या सदन से अयोग्य घोषित होने पर पूर्व विधायक की पेंशन रोक सके. आरटीआई से मिली जानकारियों में भी यह स्पष्ट हो चुका है कि सजायाफ्ता या अयोग्य ठहराए गए कई पूर्व नेता भी नियमित रूप से अपनी सरकारी पेंशन प्राप्त कर रहे हैं.
किन स्थितियों में बंद हो सकती है पेंशन?
पूर्व विधायकों की पेंशन रोकने के नियम बेहद सीमित और स्पष्ट हैं. किसी पूर्व विधायक की पेंशन केवल दो ही परिस्थितियों में रोकी जा सकती है. पहली स्थिति तब बनती है जब वह व्यक्ति दोबारा किसी सदन जैसे लोकसभा, राज्यसभा या विधानसभा का सदस्य चुन लिया जाए और वहां से वेतन ले रहा हो. दूसरी स्थिति तब होती है जब अदालत उसके चुनाव को फर्जी नामांकन या धांधली के आधार पर पूरी तरह अवैध यानी शून्य घोषित कर दे. दलबदल या पार्टी विरोधी गतिविधियों के कारण सदस्यता गंवाने पर पेंशन की राशि पर कोई असर नहीं पड़ता.
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