Kargil Vijay Diwas 2026: 26 जुलाई का दिन हर भारतीय के लिए गर्व का दिन है. यह वही तारीख है जब 1999 में भारतीय सेना ने कारगिल की बर्फीली और दुर्गम चोटियों पर पाकिस्तान को करारी शिकस्त देकर तिरंगा फिर से लहराया था. यह युद्ध सिर्फ पारंपरिक लड़ाई नहीं था, बल्कि पहाड़ी युद्ध और हवाई हमलों का मिला जुला ऐसा मोर्चा था, जिसमें भारत के जवानों ने सीमित संसाधनों के बावजूद असाधारण साहस दिखाया. इस ऐतिहासिक जीत के पीछे कुछ खास हथियारों की भूमिका आज भी हर भारतीय को गर्व से भर देती है.

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जमीन पर गरजी बोफोर्स और साथ में इंसास, एसएलआर

कारगिल युद्ध में सबसे अहम भूमिका निभाई 155 मिमी की बोफोर्स एफएच 77बी होवित्जर तोप ने, जिसे स्वीडन में बनाया गया था. इस तोप ने पहाड़ों पर दूर बैठे दुश्मन के ठिकानों पर सटीक गोलाबारी कर टाइगर हिल और तोलोलिंग जैसी चोटियों को दुश्मन से मुक्त कराने में बड़ी भूमिका निभाई थी. इसके साथ ही जवानों ने इंसास राइफल, एसएलआर, एसएएफ कार्बाइन और एके 47 जैसे छोटे हथियारों से करीबी मोर्चों पर दुश्मन का सामना किया. ग्रेनेड लॉन्चर्स की मदद से भी दुश्मन के बंकरों को दूर से ही निशाना बनाया गया था.

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आसमान से बरसे लेजर गाइडेड बम

भारतीय वायुसेना ने भी इस जंग में अहम भूमिका निभाई. मिराज 2000एच लड़ाकू विमान, जो फ्रांस में बना था, इस युद्ध में पहली बार इस्तेमाल हुआ और इसने लेजर गाइडेड बमों से दुश्मन के बंकरों को सटीक निशाना बनाया थी. इसके साथ मिग-27 'बहादुर' और मिग-29 जैसे विमानों ने ग्राउंड अटैक और हवाई सुरक्षा दोनों मोर्चों पर अहम योगदान दिया. ऊंचाई पर तेज गति से उड़ान भरकर सटीक बमबारी करने की क्षमता ने भारतीय वायुसेना को दुश्मन पर बढ़त दिला दी थी.

टैंक, हेलीकॉप्टर और आधुनिक निगरानी तकनीक भी बनी सहारा

जमीनी हमलों में टी 72 टैंकों ने भारी फायर सपोर्ट दिया, जबकि हेलीकॉप्टरों ने सैनिकों को दुर्गम इलाकों तक पहुंचाने, घायलों को निकालने और हवा से निगरानी करने में अहम भूमिका निभाई थी. इसके अलावा यूएवी यानी ड्रोन का इस्तेमाल दुश्मन की गतिविधियों पर नजर रखने के लिए किया गया, जबकि एंटी-एयरक्राफ्ट गन दुश्मन के विमानों से सुरक्षा देने के काम आईं. सीमित तकनीक के उस दौर में भी भारतीय सेना ने संसाधनों का बेहतरीन इस्तेमाल कर यह ऐतिहासिक जीत हासिल की थी, जो आज भी हर देशवासी के लिए गर्व और प्रेरणा का स्रोत है.

बोफोर्स आज भी बनी हुई है पाकिस्तान के लिए खतरा

कारगिल युद्ध के बाद से बोफोर्स तोपों को लगातार अपग्रेड किया गया है, जिससे अब इनकी रेंज पहले से कहीं ज्यादा बढ़ चुकी है. आज ये तोपें पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (PoK) में गहराई तक स्थित सैन्य ठिकानों को भी निशाना बनाने में सक्षम हैं, जिसमें स्कर्दू जैसा इलाका भी शामिल है, जहां नॉर्दर्न लाइट इन्फैंट्री की एक यूनिट तैनात है. मौजूदा समय में बोफोर्स तोपें 10,000 से 13,000 फीट की ऊंचाई पर तैनात रहती हैं, जो पाकिस्तानी सेना को लगातार यह याद दिलाती हैं कि वह आज भी इन होवित्जर तोपों की जद से बाहर नहीं है.

27 साल का साहस और बलिदान

इस साल भारत 27वां कारगिल विजय दिवस मना रहा है. यह दिन उन भारतीय जवानों के साहस, बलिदान और समर्पण को याद करने के लिए मनाया जाता है, जिन्होंने देश की सीमाओं की रक्षा के लिए अपनी जान की बाजी लगा दी थी.

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