K Annamalai Quits BJP: तमिलनाडु के सीनियर नेता के अन्नामलाई के भाजपा से इस्तीफे ने एक बार फिर उन नेताओं के राजनीतिक भविष्य पर बहस छेड़ दी है जो पार्टी से अलग होकर अपने अलग पार्टी बनाते हैं. बीते कुछ दशकों में कई बड़े भाजपा नेताओं ने पार्टी लीडरशिप से मतभेदों के बाद अपना राजनीतिक मंच बनाने की उम्मीद में ऐसा ही रास्ता अपनाया है. हालांकि इतिहास बताता है कि कुछ नेता भले ही कुछ समय के लिए राजनीतिक हलचल पैदा करने में कामयाब रहे लेकिन ज्यादातर नेता आखिरकार भाजपा में ही लौट आए या फिर मुख्यधारा की राजनीति से गायब हो गए. आइए जानते हैं उन सभी नेताओं के बारे में जिन्होंने भाजपा छोड़ने के बाद अपनी खुद की पार्टी बनाई थी.

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कल्याण सिंह की राष्ट्रीय क्रांति पार्टी 

उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह ने पार्टी लीडरशिप से मतभेदों की वजह से 1999 में भाजपा छोड़ दी और राष्ट्रीय क्रांति पार्टी बनाई. पार्टी 2002 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में चार सीट जीतने में कामयाब रही और सरकार बनाने में कुछ समय के लिए भूमिका निभाई.

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शुरुआती सफलता के बावजूद पार्टी अपनी रफ्तार बनाए रखने में संघर्ष करती रही. कल्याण सिंह आखिरकार भाजपा में लौट आए. बाद में वे राजस्थान के राज्यपाल बने और 2021 में अपनी मृत्यु तक सम्मानित व्यक्ति बने रहे. 

उमा भारती की भारतीय जनशक्ति पार्टी 

राम मंदिर आंदोलन में एक बड़ा चेहरा और मध्य प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री उमा भारती को 2005 में भाजपा से निकाल दिया गया था. इसके जवाब में उन्होंने 2006 में भारतीय जनशक्ति पार्टी शुरू की. हालांकि नई पार्टी चुनावी तौर पर कोई खास असर नहीं डाल पाई. राज्य चुनाव में खराब प्रदर्शन ने उनके राजनीतिक प्रभाव को कमजोर कर दिया और इस प्रयोग से उन्हें वैसी सफलता नहीं मिल पाई जैसी उन्होंने उम्मीद की थी. एक अलग राजनीतिक मंच की सीमाओं को समझते हुए उमा भारती 2011 में भाजपा में लौट आई और बाद में नरेंद्र मोदी सरकार में केंद्रीय मंत्री बनी.

येदियुरप्पा की पार्टी ने लगाई भाजपा में सेंध

शायद बीजेपी के सबसे सफल क्षेत्रीय नेताओं में से एक बी एस येदियुरप्पा ने भ्रष्टाचार के आरोपों के बीच कर्नाटक के मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देने के लिए मजबूर किए जाने के बाद 2012 में पार्टी छोड़ दी थी. उन्होंने कर्नाटक जनता पक्ष बनाया. 2013 के कर्नाटक विधानसभा चुनाव में इस पार्टी ने सिर्फ 6 सीट जीती लेकिन इसने भाजपा के वोट में बड़ी सेंध लगाई.  इस वजह से राज्य में पार्टी की हार हुई. बीजेपी लीडरशिप ने जल्द ही येदियुरप्पा के असर को समझा और 2014 के लोकसभा चुनावों से पहले उनका पार्टी में स्वागत किया.

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बाबूलाल मरांडी की वापसी 

झारखंड के पहले मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी ने 2006 में भाजपा छोड़ दी और झारखंड विकास मोर्चा शुरू किया. एक दशक से ज्यादा समय तक उन्होंने पार्टी को एक क्षेत्रीय ताकत के तौर पर स्थापित करने की कोशिश की. शुरुआती सालों में पार्टी को थोड़ी सफलता मिली लेकिन पार्टी छोड़ने वालों और संगठन से जुड़ी चुनौतियों ने धीरे-धीरे उसकी स्थिति को कमजोर कर दिया. 2020 में मरांडी ने अपनी पार्टी का भाजपा में विलय कर दिया. 

शंकरसिंह वाघेला का राजनीतिक सफर 

गुजरात के वरिष्ठ नेता शंकरसिंह वाघेला ने 1996 में भाजपा के खिलाफ बगावत की और राष्ट्रीय जनता पार्टी बनाई. कांग्रेस के समर्थन से वे गुजरात के मुख्यमंत्री भी बने. हालांकि उनकी स्वतंत्र राजनीतिक पहल ज्यादा समय तक नहीं चल पाई. आखिरकार पार्टी का कांग्रेस में विलय हो गया. वहां वाघेला ने कई साल बिताए और फिर अलग हो गए. हालांकि वे कई राजनीतिक पहलों के जरिए सक्रिय रहे लेकिन अब गुजरात की राजनीति में उनकी कोई केंद्रीय भूमिका नहीं है.

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