मिडिल ईस्ट में हालिया जंग के बाद सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या ईरान परमाणु बम बनाने के करीब पहुंच गया था. कुछ लोग मानते हैं कि उसके पास गुप्त हथियार है, जबकि अंतरराष्ट्रीय एजेंसियां कुछ और कहती हैं. यूरेनियम संवर्धन, 2015 का समझौता, अमेरिकी प्रतिबंध और 2025 के हमले-इन सबके बीच सच्चाई क्या है, यह समझना जरूरी है, कि आखिर ईरान परमाणु बम बनाने के कितने करीब पहुंच गया था.

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क्या ईरान के पास परमाणु बम है?

अंतरराष्ट्रीय खुफिया एजेंसियों और उपलब्ध सार्वजनिक रिपोर्टों के अनुसार, ईरान के पास फिलहाल कोई परमाणु बम या घोषित परमाणु हथियार नहीं है. अमेरिकी खुफिया एजेंसी CIA और अन्य एजेंसियों का आकलन रहा है कि ईरान ने 2003 के बाद सक्रिय रूप से परमाणु हथियार बनाने का कार्यक्रम नहीं चलाया. हालांकि, यह भी माना जाता है कि उसके पास परमाणु हथियार बनाने की तकनीकी क्षमता और पर्याप्त संवर्धित यूरेनियम इकट्ठा करने की क्षमता मौजूद है.

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यानी स्थिति यह है कि ईरान के पास हथियार नहीं है, लेकिन अगर वह राजनीतिक फैसला करे तो वह अपेक्षाकृत कम समय में हथियार-ग्रेड यूरेनियम तैयार कर सकता है.

1980 के दशक से शुरू हुआ कार्यक्रम

बीबीसी की रिपोर्ट बताती है कि ईरान का परमाणु कार्यक्रम 1980 के दशक से चल रहा है. ईरान हमेशा कहता रहा है कि उसका कार्यक्रम सिर्फ शांतिपूर्ण उद्देश्यों जैसे बिजली उत्पादन, चिकित्सा और अनुसंधान के लिए है. लेकिन अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) की करीब दस साल लंबी जांच में पाया गया कि 1980 के दशक के अंत से 2003 तक ईरान ने परमाणु विस्फोटक उपकरण के विकास से जुड़ी गतिविधियां की थीं.

इस गुप्त कार्यक्रम को प्रोजेक्ट अमाद कहा गया. इसमें हथियार डिजाइन, यूरेनियम संवर्धन और मिसाइल डिलीवरी सिस्टम से जुड़े काम शामिल थे. बाद में ईरान ने यह कार्यक्रम बंद कर दिया था.

2003 के बाद क्या बदला?

अमेरिकी खुफिया रिपोर्टों के मुताबिक, 2003 में ईरान ने अपना संगठित परमाणु हथियार कार्यक्रम रोक दिया. उसके बाद से हथियार बनाने की सीधी गतिविधियों के ठोस प्रमाण नहीं मिले. 2015 में IAEA ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि 2009 के बाद परमाणु विस्फोटक उपकरण के विकास से जुड़ी गतिविधियों के विश्वसनीय संकेत नहीं मिले.

हालांकि इसी दौरान 2009 में पश्चिमी खुफिया एजेंसियों ने फोर्दो परमाणु संयंत्र का खुलासा किया, जो पहाड़ के अंदर बना संवर्धन केंद्र था. 

2015 का परमाणु समझौता

रिपोर्ट के अनुसार 2015 में ईरान ने अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, रूस, चीन और जर्मनी के साथ एक बड़ा समझौता किया, जिसे आम तौर पर ईरान न्यूक्लियर डील कहा जाता है. इस समझौते के तहत ईरान ने यूरेनियम संवर्धन को 3.67 प्रतिशत तक सीमित रखने, फोर्दो में संवर्धन रोकने और सख्त अंतरराष्ट्रीय निगरानी स्वीकार करने पर सहमति दी. बदले में उस पर लगे आर्थिक प्रतिबंधों में राहत दी गई.

3.67 प्रतिशत संवर्धन बिजली उत्पादन के लिए उपयुक्त है. परमाणु हथियार के लिए आमतौर पर 90 प्रतिशत के करीब संवर्धन चाहिए.

2018 में कितने हालात बदले?

2018 में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस समझौते से अमेरिका को अलग कर लिया. उनका कहना था कि यह समझौता ईरान को लंबे समय में परमाणु बम बनाने से रोकने के लिए पर्याप्त नहीं है. अमेरिका के हटने के बाद उसने ईरान पर फिर से कड़े आर्थिक प्रतिबंध लगा दिए. इसके जवाब में ईरान ने समझौते की शर्तों का उल्लंघन करना शुरू किया. उसने यूरेनियम संवर्धन की सीमा बढ़ाकर 60 प्रतिशत तक कर दी, उन्नत सेंट्रीफ्यूज लगाए और फोर्दो में फिर से संवर्धन शुरू कर दिया. 

परमाणु हथियारों से कितनी दूर था ईरान?

अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी के अनुसार, 13 जून 2025 को जब इसराइल ने हवाई हमले शुरू किए, उस समय ईरान के पास 60 प्रतिशत तक शुद्धता वाला लगभग 440 किलोग्राम संवर्धित यूरेनियम था. यह स्तर 90 प्रतिशत के हथियार-ग्रेड यूरेनियम से सिर्फ एक तकनीकी कदम दूर माना जाता है.

IAEA प्रमुख राफेल ग्रोसी ने अक्टूबर में कहा था कि अगर इस यूरेनियम को और संवर्धित किया जाए तो यह सैद्धांतिक रूप से लगभग दस परमाणु बम बनाने के लिए पर्याप्त हो सकता है. हालांकि यह केवल सामग्री की क्षमता है. वास्तविक हथियार बनाना, उसका डिजाइन, परीक्षण और डिलीवरी सिस्टम विकसित करना अलग और समय लेने वाली प्रक्रिया है.

ब्रेकआउट टाइम कितना कम हुआ?

खुफिया आकलनों के अनुसार, हमलों से पहले ईरान का ब्रेकआउट टाइम यानी पर्याप्त हथियार-ग्रेड यूरेनियम तैयार करने का समय एक हफ्ते से भी कम हो सकता था, अगर वह ऐसा करने का फैसला करे. लेकिन पूर्ण परमाणु बम बनाने में कई महीने से लेकर 1 से 3 साल तक लग सकते थे. इसमें डिजाइन, असेंबली और परीक्षण शामिल हैं.

2025 के हमले और नुकसान

जून 2025 में इसराइल और ईरान के बीच 12 दिन तक युद्ध चला था. इस दौरान ईरान के प्रमुख परमाणु ठिकानों पर हमले हुए. अमेरिका भी कुछ समय के लिए इस संघर्ष में शामिल हुआ और उसने इस्फहान, नतांज और फोर्दो स्थित तीन बड़े परमाणु ठिकानों पर हमले किए. इस्फहान ईरान का सबसे बड़ा न्यूक्लियर रिसर्च सेंटर है, जबकि नतांज और फोर्दो यूरेनियम संवर्धन केंद्र हैं.

अमेरिका ने दावा किया कि ये परमाणु ठिकाने पूरी तरह तबाह कर दिए गए, लेकिन एक हफ्ते बाद IAEA प्रमुख राफेल ग्रोसी ने कहा कि उन ठिकानों पर गंभीर नुकसान तो हुआ है, पर पूरी तरह तबाही नहीं हुई. उन्होंने संकेत दिया कि कुछ महीनों में संवर्धन प्रक्रिया फिर शुरू हो सकती है.

CIA का क्या था आकलन?

जून 2025 में CIA डायरेक्टर जॉन रैटक्लिफ की रिपोर्ट में कहा गया कि हमलों से ईरान का परमाणु कार्यक्रम गंभीर रूप से क्षतिग्रस्त हुआ है और कई सुविधाएं नष्ट हुई हैं. रिपोर्ट के अनुसार, कार्यक्रम को फिर से पूरी क्षमता में लाने में वर्षों लग सकते हैं. हालांकि CIA ने अब तक यह पुष्टि नहीं की है कि ईरान सक्रिय रूप से परमाणु हथियार बना रहा है.

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