प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जल्द ही शंघाई सहयोग संगठन यानि SCO की बैठक में हिस्सा लेने जा रहे हैं. विदेश मंत्रालय ने इस बात की जानकारी दी है कि यह बैठक चीन के तियानजिन शहर में होगी. विदेश मंत्रालय के सेक्रेट्री तन्मय लाल ने बताया कि पीएम मोदी को इस समिट में शामिल होने का न्योता चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने दिया है. इस दौरान पीएम मोदी कई देशों के नेताओं से मुलाकात भी कर सकते हैं. ऐसे में सवाल उठ रहा है कि क्या इस बैठक में ट्रंप की दादागिरी से निपटने का इंतजाम होगा? इसी कड़ी में अब यह भी जान लेते हैं कि आखिर ट्रंप की दादागिरी में कैसे दुनिया ग्लोबल साउथ और ग्लोबल नॉर्थ दो हिस्सों में बंट रही है.

टैरिफ वॉर से साफ दिख रहा बंटवारा

दुनिया की राजनीति और अर्थव्यवस्था आज फिर से दो हिस्सों में बंटती हुई नजर आ रही है. एक तरफ हैं ग्लोबल नॉर्थ यानी अमीर और विकसित देश, वहीं दूसरी तरफ ग्लोबल साउथ यानी विकासशील और उभरती अर्थव्यवस्थाएं शामिल हैं. हाल ही में अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की आक्रामक नीतियों और टैरिफ वॉर ने इस बंटवारे को और साफ कर दिया है.

क्या है ग्लोबल नॉर्थ?

अब यह भी जान लेते हैं कि आखिर ग्लोबल नॉर्थ किसे कहा जाता है. ग्लोबल नॉर्थ उन देशों को कहा जाता है जो आर्थिक, तकनीकी और राजनीतिक रूप से विकसित हैं. इनमें अमेरिका, कनाडा, यूरोपियन यूनियन, जापान, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड जैसे देश आते हैं. ये देश दुनिया की कुल संपत्ति और तकनीक का बड़ा हिस्सा अपने पास रखते हैं और अंतरराष्ट्रीय व्यापार नियमों पर भी काफी हद तक इन्हीं का दबदबा है.

क्या है ग्लोबल साउथ?

ग्लोबल साउथ का मतलब है एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के वो देश जो या तो विकासशील हैं या फिर उभरती अर्थव्यवस्थाएं हैं. भारत, ब्राजील, इंडोनेशिया, साउथ अफ्रीका, नाइजीरिया जैसे देश इसमें आते हैं. इन देशों के पास जनसंख्या ज्यादा है, लेकिन संसाधनों और तकनीकी विकास की कमी है. यही कारण है कि इन्हें ग्लोबल नॉर्थ पर आर्थिक और राजनीतिक मामलों में निर्भर रहना पड़ता है.

ट्रंप की दादागिरी और नया बंटवारा

डोनाल्ड ट्रंप ने राष्ट्रपति पद पर रहते हुए अमेरिका फर्स्ट नीति को सबसे ऊपर रखा है. उनका कहना था कि अमेरिका अब दूसरे देशों के लिए फ्री लंच नहीं देगा. इसी सोच के चलते ट्रंप ने भारत, चीन और यूरोप जैसे देशों पर भारी टैरिफ लगाए हैं.

हाल ही में भारत पर 50% तक का टैरिफ लगाना इसी रणनीति का हिस्सा है. ट्रंप का यह कदम सिर्फ भारत को ही नहीं, बल्कि पूरे ग्लोबल साउथ को यह संदेश देता है कि अगर कोई देश अमेरिका के हितों से अलग चलता है तो उसे आर्थिक झटका झेलना पड़ेगा. यही ट्रंप की दादागिरी है. 

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