वैश्विक राजनीति के मंच पर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक ऐसा बड़ा कूटनीतिक दांव चल दिया है, जिसने पाकिस्तान को बेहद मुश्किल चौराहे पर लाकर खड़ा कर दिया है. ट्रंप प्रशासन लगातार यह दबाव बना रहा है कि पाकिस्तान ऐतिहासिक 'अब्राहम अकॉर्ड' का हिस्सा बने और इजरायल को एक स्वतंत्र देश के रूप में पूरी मान्यता दे. अमेरिका का मानना है कि ईरान के साथ भविष्य में किसी भी स्थायी शांति समझौते को अमलीजामा पहनाने के लिए पाकिस्तान का इस गठबंधन में शामिल होना बेहद जरूरी है. इस कूटनीतिक चक्रव्यूह ने पाकिस्तान के सामने आगे कुआं पीछे खाई जैसी गंभीर स्थिति पैदा कर दी है, क्योंकि इस समझौते पर हस्ताक्षर करते ही उसे अपने देश का एक ऐसा बेहद पुराना और कट्टर नियम बदलना पड़ेगा, जिससे वहां का हर नागरिक बेहद नफरत करता है. 

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ट्रंप का कूटनीतिक चक्रव्यूह

अमेरिकी राष्ट्रपति ने ईरान के साथ जारी विवादों के बीच पाकिस्तान को घेरने के लिए अब्राहम समझौते का सहारा लिया है. अमेरिका की तरफ से इस्लामाबाद पर इस बात का भारी दबाव बनाया जा रहा है कि वह इजरायल के साथ अपने दशकों पुराने विवाद को भुलाकर उसे एक संप्रभु राष्ट्र के रूप में आधिकारिक मान्यता प्रदान करे. अमेरिकी प्रशासन का साफ कहना है कि मध्य पूर्व एशिया में स्थायी शांति की स्थापना के लिए पाकिस्तान का इस कूटनीतिक समझौते की छतरी के नीचे आना बेहद अनिवार्य हो चुका है. ट्रंप की इस एक चाल ने पाकिस्तानी हुक्मरानों को ऐसे मोड़ पर लाकर खड़ा कर दिया है, जहां अमेरिकी बात मानने पर उन्हें अपने ही देश में भारी बगावत और गुस्से का सामना करना पड़ेगा, जबकि बात न मानने पर अमेरिका की सीधे तौर पर नाराजगी झेलनी होगी. 

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पाकिस्तान का पासपोर्ट का नियम

अगर पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय दबाव के आगे घुटने टेकते हुए इस अब्राहम समझौते पर राजी हो जाता है, तो उसे सबसे पहले अपने देश का वह पासपोर्ट नियम पूरी तरह बदलना होगा जो उसकी पहचान से जुड़ा है. मौजूदा समय में पाकिस्तान पूरी दुनिया का एकमात्र ऐसा देश है जिसके आधिकारिक पासपोर्ट पर बहुत साफ शब्दों में यह चेतावनी लिखी होती है कि 'यह पासपोर्ट इजरायल को छोड़कर दुनिया के सभी देशों की यात्रा के लिए पूरी तरह मान्य है'. इस कूटनीतिक समझौते का हिस्सा बनते ही पाकिस्तान को अपने पासपोर्ट से इस कड़े नियम और पंक्ति को हमेशा के लिए हटाना पड़ेगा. यह एक ऐसा फैसला होगा जिसे लागू करना किसी भी पाकिस्तानी सरकार के लिए देश के भीतर सबसे मुश्किल काम साबित होने वाला है.

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व्यापारिक पाबंदियों का खात्मा

अब्राहम समझौते की शर्तों के मुताबिक, इजरायल को एक देश के रूप में स्वीकार करने के बाद पाकिस्तान को उस पर लगाए गए अपने सभी आर्थिक और यात्रा प्रतिबंध तुरंत प्रभाव से हटाने होंगे. वर्तमान इतिहास गवाह है कि आधिकारिक रूप से पाकिस्तान और इजरायल के बीच किसी भी तरह के राजनयिक, व्यापारिक या सांस्कृतिक संबंध अस्तित्व में नहीं हैं. लेकिन इस वैश्विक समझौते को अपनाने के बाद पाकिस्तान को न सिर्फ इजरायल के साथ सीधे व्यापार की शुरुआत करनी होगी, बल्कि दोनों देशों को एक-दूसरे के यहां अपने दूतावास भी खोलने होंगे. इसके साथ ही दोनों देशों के बीच सीधी हवाई उड़ानों की आवाजाही को भी हरी झंडी देनी होगी, जो मौजूदा पाकिस्तानी व्यवस्था के लिए एक बेहद अकल्पनीय कदम माना जाता है. 

अब्राहम समझौते पर पाकिस्तान का आधिकारिक रुख

क्षेत्र में चल रही अमेरिकी शांति पहलों और चौतरफा दबाव के बावजूद पाकिस्तान ने फिलहाल इस अब्राहम समझौते में शामिल होने से पूरी तरह इनकार कर दिया है. पाकिस्तान के रक्षा मंत्री और सरकार ने इस बेहद संवेदनशील मुद्दे पर अपना पुराना आधिकारिक रुख एक बार फिर दुनिया के सामने दोहराया है. पाकिस्तानी नेतृत्व का स्पष्ट कहना है कि वे किसी भी कीमत पर इजरायल को तब तक एक संप्रभु राष्ट्र के रूप में स्वीकार नहीं कर सकते, जब तक कि साल 1967 की पुरानी सीमाओं के आधार पर एक स्वतंत्र फिलिस्तीनी राज्य का निर्माण नहीं हो जाता है. पाकिस्तान आज भी पूर्वी यरुशलम को स्वतंत्र फिलिस्तीन की राजधानी के रूप में देखने की अपनी पुरानी मांग पर अड़ा हुआ है. 

आंतरिक बगावत का डर

पाकिस्तानी हुक्मरानों के लिए इस समझौते को स्वीकार न करने की सबसे बड़ी वजह देश के भीतर फैला हुआ भयंकर जन-आक्रोश और मजहबी कट्टरता है. पाकिस्तान की आम जनता, धार्मिक संगठन और राजनीतिक दल इजरायल के नाम से ही सख्त नफरत करते हैं और फिलिस्तीन के मुद्दे पर बेहद भावुक हैं. ऐसे में अगर सरकार अमेरिका के आर्थिक या राजनीतिक दबाव में आकर इजरायल के साथ दोस्ती का हाथ आगे बढ़ाती है, तो देश के भीतर ऐसी हिंसक बगावत शुरू हो सकती है, जिसे संभालना वहां की सेना के लिए भी नामुमकिन हो जाएगा. यही वजह है कि पाकिस्तान सरकार इस कड़वी कूटनीतिक गोली को निगलने की हिम्मत नहीं जुटा पा रही है.

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