Satellite Crash Law: अंतरिक्ष भले ही रोजमर्रा की जिंदगी से काफी दूर लगता हो लेकिन सैटेलाइट और दूसरे स्पेसक्राफ्ट अक्सर आबादी वाले इलाकों के ऊपर से गुजरते हैं. जैसे-जैसे सरकारी और प्राइवेट सेटेलाइट की संख्या बढ़ रही है अंतरिक्ष के मलबे या फिर खराब स्पेसक्राफ्ट सिक्योरिटी से धरती पर होने वाले नुकसान का मुद्दा एक बड़ा सवाल बन चुका है. अगर कोई सैटेलाइट किसी घर, गाड़ी या फिर दूसरी संपत्ति पर गिरती है तो नुकसान की भरपाई कौन करेगा? आइए जानते हैं क्या कहता है इंटरनेशनल स्पेस लॉ.

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लायबिलिटी कन्वेंशन क्या कहता है? 

अंतरिक्ष की चीजों से होने वाले नुकसान के मुआवजा से जुड़ा मुख्य इंटरनेशनल फ्रेमवर्क 1972 का कन्वेंशन ऑन इंटरनेशनल लायबिलिटी फॉर डैमेज कॉज्ड बाय स्पेस ऑब्जेक्ट्स है. इसे आमतौर पर लायबिलिटी कन्वेंशन के नाम से जाना जाता है. यह कन्वेंशन धरती पर होने वाले नुकसान और बाहरी अंतरिक्ष में होने वाले नुकसान के बीच फर्क करता है. यह फर्क इस वजह से जरूरी है क्योंकि नुकसान कहां हुआ है इस आधार पर जिम्मेदारी तय करने का कानूनी पैमाना बदल जाता है. 

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धरती पर नुकसान के लिए पूरी जिम्मेदारी 

अगर किसी लॉन्चिंग स्टेट का सेटेलाइट, रॉकेट या फिर अंतरिक्ष का मलबा धरती पर लोगों या फिर संपत्ति को नुकसान पहुंचाता है तो लॉन्चिंग स्टेट की पूरी जिम्मेदारी होती है. इसका मतलब यह है कि प्रभावित देश को आमतौर पर यह साबित करने की जरूरत नहीं होती कि लॉन्चिंग स्टेट ने लापरवाही बरती या फिर कोई गलती की. अगर अंतरिक्ष की चीज से धरती पर ऐसा नुकसान होता है जिसके लिए मुआवजा दिया जा सकता है तो लॉन्चिंग स्टेट को मुआवजा देने के लिए कहा जा सकता है. 

उदाहरण के लिए अगर किसी सैटेलाइट का मलबा किसी घर या फिर गाड़ी पर गिरता है और नुकसान पहुंचाता है तो कन्वेंशन के तहत उस देश को जिम्मेदार ठहराया जा सकता है जिसे कानूनी तौर पर लॉन्चिंग स्टेट माना गया था. 

अंतरिक्ष में होने वाली दुर्घटना के लिए नियम 

जब बाहरी अंतरिक्ष में टक्कर होती है तो कानूनी स्थिति बदल जाती है. अगर एक सैटेलाइट दूसरे सेटेलाइट से टकराता है तो जिम्मेदारी आमतौर पर गलती पर आधारित होती है. दूसरे शब्दों में प्रभावित पक्ष को या साबित करना होगा की दूसरी अंतरिक्ष चीज के लिए जिम्मेदार लॉन्चिंग स्टेट की गलती थी या फिर उसने लापरवाही बरती थी. 

प्राइवेट कंपनी का सेटेलाइट हो तो क्या होगा? 

1967 की आउटर स्पेस ट्रीटी एक और जरूरी सिद्धांत तय करती है. इसके प्रावधान के तहत देश अपनी सरकारी एजेंसी और अपने अधिकार क्षेत्र में आने वाली प्राइवेट संस्था द्वारा की जाने वाली अंतरिक्ष गतिविधि के लिए इंटरनेशनल स्तर पर जिम्मेदार बने रहते हैं. 

इस वजह से भले ही सैटेलाइट किसी प्राइवेट कंपनी का हो, इंटरनेशनल जिम्मेदारी खत्म नहीं होती. अगर किसी प्राइवेट सेटेलाइट से कोई नुकसान होता है तो प्रभावित देश संबंधित सरकारी तंत्र के जरिए इस मामले को आगे बढ़ा सकता है. सेटेलाइट पर प्राइवेट कंपनी का मालिकाना हक होने के बावजूद उसे लॉन्च करने वाले देश की अतिरिक्त जिम्मेदारी खत्म नहीं होती.

एक आम आदमी मुआवजे का दावा कैसे कर सकता है? 

जिस व्यक्ति की संपत्ति सेटेलाइट के मलबे के गिरने से नुकसान ग्रस्त होती है उससे आमतौर पर यह उम्मीद नहीं की जाती कि वह लायबिलिटी कन्वेंशन के तहत सीधे किसी विदेशी सरकार पर मुकदमा करे. इसके बजाय यह प्रक्रिया सरकारों के जरिए काम करती है. 

प्रभावित व्यक्ति सबसे पहले अपने देश के अधिकारियों को घटना और नुकसान की जानकारी देगा. इसके बाद सरकार संबंधित लॉन्च करने वाले देश के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय दावा कर सकती है. अगर मुआवजा मिलता है तो घरेलू सरकार अपनी लागू प्रकिया और कानून के मुताबिक उसका वितरण करेगी. यह सिस्टम इस वजह से है क्योंकि अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष कानून के दावों को मुख्य रूप से देशों के बीच निपटाया जाता है. 

लॉन्चिंग स्टेट कौन होता है? 

एक सैटेलाइट का संबंध एक से ज्यादा देशों से हो सकता है इस वजह से लायबिलिटी कन्वेंशन में लॉन्चिंग स्टेट की एक अलग परिभाषा दी गई है. इसमें वह देश शामिल हो सकता है जो अंतरराष्ट्रीय वस्तु को लांच करता है, वह देश जो इसके लॉन्च का प्रबंध या फिर व्यवस्था करता है, यह देश इसके क्षेत्र से लॉन्च किया जाता है और वह देश जिसकी लॉन्च सुविधा का इस्तेमाल किया जाता है. यही वजह है कि एक ही अंतरिक्ष वस्तु के लिए एक से ज्यादा देश संभावित रूप से जिम्मेदारी साझा कर सकते हैं.

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