Ancient India Land Rights: प्राचीन और मध्यकालीन भारत में जमीन के मालिकाना हक का तरीका आज के डिजिटल रिकॉर्ड, रजिस्ट्री डीड और ऑनलाइन प्रॉपर्टी डेटाबेस से काफी अलग था. राजाओं के शासनकाल में कोई कंप्यूटराइज्ड रिकॉर्ड या फिर सेंट्रलाइज्ड जमीन रजिस्ट्रेशन सिस्टम नहीं था. इसके बजाय जमीन के अधिकार शाही सत्ता, गांव की संस्थाओं और लंबे समय से चले आ रहे कब्जे के आधार पर तय किए जाते थे. मनुस्मृति, अर्थशास्त्र और बृहस्पति स्मृति जैसे प्राचीन कानूनी ग्रंथों में यह बताया गया है कि मालिकाना हक को कैसे मान्यता दी जाती थी.

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जमीन का मालिकाना हक कैसे तय होता था?

प्राचीन भारतीय कानूनी परंपराओं में कई ऐसे तरीके थे जिनसे कोई व्यक्ति जमीन पर अपना मलिकाना हक कायम कर सकता था.  सबसे शुरुआती सिद्धांतों में से एक था मेहनत के जरिए अधिकार मिलना. मनुस्मृति के मुताबिक जो व्यक्ति सबसे पहले जंगल साफ करके उसे खेती लायक जमीन में बदलता था उसे ही उसका असली मालिक माना जाता था. वक्त के साथ एक और सिद्धांत विकसित हुआ जिसमें राजाओं को राज्य की सभी जमीनों का सर्वोच्च अधिकारी माना जाता था. गुप्त काल के दौरान और उसके बाद शासकों को जमीन का असली मालिक माना जाता था. हालांकि इसका मतलब यह नहीं था कि जमीन का हर टुकड़ा व्यक्तिगत रूप से राजा का ही था. बल्कि राजा के पास टैक्स लगाने, किसानों की रक्षा करने और जमीन के प्रशासन को रेगुलेट करने का अधिकार था.

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लंबे वक्त तक कब्जा भी मालिकाना हक का एक जरूरी आधार बन गया. बृहस्पति स्मृति के मुताबिक अगर कोई परिवार लगभग 30 साल या फिर तीन पीढ़ियों तक किसी जमीन के टुकड़े पर बिना किसी विवाद के कब्जा बनाए रखता था तो उसे उस प्रॉपर्टी पर कानूनी अधिकार मिल जाता था.

जमीन का लेन-देन कैसे होता था?

आजकल प्रॉपर्टी की बिक्री के उलट प्राचीन समय में जमीन के लेन-देन पर स्थानीय समुदाय का काफी ज्यादा कंट्रोल होता था. शुरुआती दौर में जमीन बेचने को आमतौर पर अच्छा नहीं माना जाता था. जैसे-जैसे राज्यों का विस्तार हुआ और आर्थिक गतिविधियां बढ़ी जमीन की खरीद फरोख्त धीरे-धीरे स्वीकार्य हो गई. लेकिन कड़े नियमों के तहत. 

सबसे जरूरी शर्तों में से एक थी गांव के समुदाय से मंजूरी. जमीन का मालिक ग्राम सभा या फिर ग्राम परिषद की सहमति के बिना किसी बाहरी व्यक्ति को जमीन नहीं बेच सकता था. इस सिस्टम से गांव की सुरक्षा, खेती से जुड़े हित और सामाजिक ढांचे की रक्षा करने में मदद मिलती थी. 

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लिखित दस्तावेजों का इस्तेमाल 

इस धारणा के उलट की प्राचीन जमीन के सौदे सिर्फ जुबानी समझौते पर आधारित होते थे लिखित दस्तावेजों ने भी एक बड़ी भूमिका निभाई थी. बिक्री का दस्तावेज जिन्हें क्रय पत्र भी कहा जाता था, भोजपत्र, ताड़ के पत्तों या फिर कपड़े जैसी चीजों पर तैयार किए जाते थे.

इन दस्तावेजों को शाही अधिकारियों, गांव के मुखियाओं और सम्मानित गवाहों के हस्ताक्षर या फिर निशान से प्रमाणित किया जाता था. ऐसे लिखित रिकॉर्ड मालिकाना हक के कानूनी सबूत के तौर पर काम आते थे.

तांबे की प्लेटें 

बड़ी जागीरों, गांव या फिर शाही अनुदानों से जुड़े जमीन के बड़े लेन-देन के लिए राजा तांबे की प्लेट पर लिखो लेखों का इस्तेमाल करते थे. इन्हें ताम्रपत्र कहा जाता था. इन प्लेटों में लेन-देन की पूरी जानकारी होती थी और उन पर शाही निशान की मोहर लगी होती थी. इतिहासकारों और पुरातत्व विभागों को पूरे भारत में ऐसे कई ताम्रपत्र मिले हैं.

इसी के साथ जमीन के हस्तांतरण का एकमात्र तरीका खरीदना और बेचना ही नहीं था. राजा अक्सर धार्मिक, शैक्षिक और धर्मार्थ कार्यों के लिए जमीन दान कर देते थे. टैक्स-फ्री अनुदानों को आमतौर पर ब्रह्मदेय अनुदान कहा जाता था. यह अक्सर मंदिर, विद्वान और ब्राह्मणों को दिया जाता था.

दिल्ली सल्तनत और मुगल काल के दौरान जागीरदारी और मनसबदारी व्यवस्था शुरू हो गई थी. इन व्यवस्थाओं के तहत शासक नकद वेतन देने के बजाय सैन्य कमांडरों और अधिकारियों को जमीन से मिलने वाले राजस्व के अधिकार सौंपते थे. ये अधिकारी सौंपी गई जमीन से टैक्स तो वसूल सकते थे लेकिन आमतौर पर उनके पास जमीन का पूरा मालिकाना हक या फिर उसे बेचने का अधिकार नहीं होता था.

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