आज के आधुनिक दौर में भीषण गर्मी से राहत पाने के लिए हमारे पास फ्रिज, एयर कंडीशनर और आइस मेकर जैसी तमाम सुविधाएं मौजूद हैं. लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि सदियों पहले जब बिजली का नामोनिशान नहीं था, तब भारत के राजा-महाराजा और मुगल बादशाह गर्मियों में ठंडा पानी कैसे पीते थे? उस दौर में राजघरानों के लिए न सिर्फ ठंडे पानी बल्कि असली बर्फ का भी पूरा इंतजाम किया जाता था. चिलचिलाती धूप में भी शाही रसोइयों में ठंडे शरबत, कुल्फी और मिठाइयां परोसी जाती थीं. बिना किसी आधुनिक मशीन के बर्फ को बनाने, उसे दूर-दूर से मंगाने और महीनों तक सुरक्षित रखने के पीछे का विज्ञान बेहद हैरान करने वाला है.

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हिमालय के शिखरों से शाही सफर

मुगलकाल में गर्मियों के दौरान बर्फ हासिल करने का सबसे मुख्य जरिया उत्तर भारत के ऊंचे और बर्फीले पहाड़ हुआ करते थे. हुमायूं और अकबर के शासनकाल के दौरान कश्मीर, हिमाचल और गढ़वाल के पहाड़ी इलाकों से दिल्ली और आगरा तक बर्फ लाने की पूरी व्यवस्था मौजूद थी. सर्दियों के मौसम में पहाड़ों पर जमी प्राकृतिक बर्फ को बड़े-बड़े टुकड़ों में काटा जाता था. इसके बाद खास रास्तों और नावों के जरिए इस बर्फ को बेहद तेजी से दिल्ली के पास यमुना नदी के किनारों तक पहुंचाया जाता था, ताकि रास्ते में वह पिघल न जाए.

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भूमिगत बर्फघरों की अनूठी तकनीक

लाए गए बर्फ के इन विशाल टुकड़ों को गर्मियों के अंत तक सुरक्षित रखने के लिए मुगलों ने दिल्ली, आगरा और लाहौर में विशेष 'बर्फघर' बनवाए थे. ये असल में जमीन के नीचे बने गहरे गड्ढे या तहखाने होते थे, जिनकी दीवारें बहुत मोटी और इंसुलेटेड बनाई जाती थीं. इन तहखानों में बर्फ को रखने के बाद उसे भूसे, राख, जूट की बोरियों और मोटे कपड़ों में अच्छी तरह लपेटकर दबा दिया जाता था. यह प्राचीन इंसुलेशन तकनीक बाहर की गर्मी को अंदर नहीं आने देती थी और बर्फ महीनों तक बिना पिघले वैसी ही बनी रहती थी.

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बर्फघरों की सुरक्षा शाही आबदारों की बड़ी जिम्मेदारी

इन भूमिगत बर्फघरों की सुरक्षा और देखरेख का काम कोई मामूली काम नहीं था, इसके लिए बकायदा पढ़े-लिखे और अनुभवी कर्मचारी तैनात किए जाते थे. मुगल दरबार में इन खास कर्मचारियों को आबदार कहा जाता था. आबदारों का मुख्य काम यह सुनिश्चित करना होता था कि बर्फघरों का तापमान सही रहे और बर्फ पिघलने न पाए. इसके अलावा, रोजाना शाही रसोई तक जरूरत के हिसाब से साफ बर्फ पहुंचाना और बादशाह के लिए ठंडे पेय पदार्थ तैयार करना भी इन्हीं आबदारों की देखरेख में पूरा किया जाता था.

रात में बर्फ जमाने का देसी तरीका

पहाड़ों से बर्फ मंगाने के अलावा मुगलकाल में कृत्रिम तरीके से भी बर्फ जमाई जाती थी, जिसका जिक्र शाहजहां के समय मिलता है. उत्तर प्रदेश और बंगाल के इलाकों में दिसंबर और जनवरी की बेहद सर्द रातों में खुले मैदानों के अंदर उथले तालाब खोदे जाते थे या मिट्टी के बर्तनों में पानी भरकर रख दिया जाता था. रात के ठंडे तापमान और बर्फीली हवाओं के कारण सुबह तक पानी के ऊपर बर्फ की एक पतली परत जम जाती थी. सूरज उगने से ठीक पहले इस बर्फ को इकट्ठा करके तुरंत बर्फघरों में छिपा दिया जाता था.

अमेरिकी तालाबों से भारत आई बर्फ

मुगल साम्राज्य के ढलने और 19वीं शताब्दी में ब्रिटिश काल की शुरुआत के साथ ही बर्फ के इस कारोबार में एक बहुत बड़ा वैश्विक बदलाव देखने को मिला. साल 1833 में अमेरिका के एक मशहूर व्यापारी फ्रेडरिक ट्यूडर ने भारत में बर्फ का एक्सपोर्ट शुरू कर दिया. अमेरिका के बोस्टन शहर के पास मौजूद ठंडे तालाबों से बर्फ काटी जाती थी और उसे जहाजों में लकड़ी के बुरादे और भूसे के साथ पैक करके महीनों लंबे समुद्री सफर के बाद कोलकाता, मद्रास और बंबई के बंदरगाहों तक सुरक्षित पहुंचाया जाता था.

शाही खान-पान में बर्फ का रुतबा

मुगल बादशाह गर्मियों के दिनों में गुलाब, चंदन, खस और केवड़े के बने खास शरबतों को एकदम ठंडा करने के लिए इस बर्फ का जमकर इस्तेमाल करते थे. इसके अलावा तरह-तरह के फल, गाढ़े दूध और शाही मिठाइयों को भी इसी बर्फ के बीच रखकर ठंडा किया जाता था. मुगलों के शुरुआती शासक बाबर ने भी अपनी आत्मकथा में बर्फ से ठंडे किए गए पानी के स्वाद की जमकर तारीफ की थी. उस दौर में दरबार में आने वाले खास मेहमानों को बर्फ वाला ठंडा पानी परोसना राजाओं के बड़े रुतबे और शान की निशानी माना जाता था.

इलाज और अन्य राज्यों की व्यवस्था

सौंदर्य और स्वाद के अलावा इस बर्फ का इस्तेमाल चिकित्सा के क्षेत्र में भी बड़े पैमाने पर होता था. राजघरानों में किसी को तेज बुखार होने या चोट लगने पर ठंडी सिकाई के लिए आबदार तुरंत बर्फ का इंतजाम करते थे. वहीं दक्षिण भारत के मैसूर और त्रावणकोर जैसे राजघरानों में भौगोलिक कारणों से बर्फ मिलना बहुत मुश्किल था, इसलिए वे नीलगिरि की पहाड़ियों से विशेष दूतों के जरिए बर्फ मंगवाते थे. राजस्थान के राजपूत राजा भी गर्मियों में बर्फ के लिए मध्य भारत की पहाड़ियों पर निर्भर रहते थे और इसके लिए बरफवाले नाम के कर्मचारी रखते थे.

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