India Mauritius Loan: पिछले 10 सालों में भारत ने मॉरीशस को लगभग 1.1 बिलियन डॉलर की डेवलपमेंट मदद की है. इस मदद में इंफ्रास्ट्रक्चर, हेल्थ, एजुकेशन और इकोनॉमिक डेवलपमेंट के लिए ग्रांट और लाइन्स ऑफ क्रेडिट शामिल हैं. यह फाइनेंशियल मदद हिंद महासागर क्षेत्र में दोनों देशों के बीच मजबूत स्ट्रैटेजिक और ऐतिहासिक रिश्तों को दिखाती है. आइए जानते हैं कि लोन को कैसे चुकाता है मॉरीशस.
बड़े लोन और मदद पैकेज
सितंबर 2025 में भारत ने मॉरीशस के लिए 680 मिलियन डॉलर के स्पेशल इकोनॉमिक पैकेज की घोषणा की थी. इस पैकेज में हेल्थ, एजुकेशन और इंफ्रास्ट्रक्चर जैसे सेक्टर के लिए लगभग 215 मिलियन डॉलर के ग्रांट थे. इसी के साथ इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट प्रोजेक्ट के लिए 440 मिलियन डॉलर की लाइन ऑफ क्रेडिट दी गई थी. इतना ही नहीं बल्कि फाइनेंशियल ईयर 2025-26 के लिए 25 मिलियन डॉलर की सीधी बजटीय मदद भी की गई.
पहले रुपया क्रेडिट लाइन
अक्टूबर 2024 में भारत ने मॉरीशस में पानी की पाइपलाइन बदलने के प्रोजेक्ट के लिए 487.60 करोड़ रुपये की क्रेडिट लाइन दी थी. यह इंडियन डेवलपमेंट एंड इकोनामिक असिस्टेंट स्कीम के तहत किसी भी देश को दी गई पहली भारतीय रुपये वाली लाइन ऑफ क्रेडिट थी. इस कदम ने पूरी तरह से यूएस डॉलर पर निर्भर रहने के बजाय लोकल करेंसी में व्यापार और फाइनेंशियल सहयोग को बढ़ावा देने की दिशा में एक बदलाव दिखाया था.
यह लोन कैसे चुकाए जाते हैं
भारत की मॉरीशस को फाइनेंशियल मदद मुख्य रूप से पारंपरिक कमर्शियल लोन के बजाय लाइन ऑफ क्रेडिट के जरिए दी जाती है. रियायती या फिर सॉफ्ट लोन रियायती ब्याज दरों पर दिए जाते हैं. यह इंटरनेशनल मार्केट रेट से काफी कम हैं. इससे यह लोन लेने वाले देश के लिए सस्ते और टिकाऊ बन जाते हैं. इसी के साथ ज्यादातर क्रेडिट लाइन में मोरेटोरियम या फिर ग्रेस पीरियड होता है. रीपेमेंट तभी शुरू होता है जब फंडेड प्रोजेक्ट चालू हो जाता है. इससे मॉरीशस को कर्ज चुकाने से पहले प्रोजेक्ट से रिटर्न जेनरेट करने का समय मिल जाता है.
इसी के साथ लोन लेने की रकम एक फिक्स्ड समय में पहले से तय इंस्टॉलमेंट में चुकाई जाती है. हाल ही में रुपये में शुरू हुई क्रेडिट लाइन को स्टेट बैंक आफ इंडिया मैनेज कर रहा है. यह डिस्बर्समेंट और रीपेमेंट मेकैनिज्म की देखरेख करता है. इंडियन डेवलपमेंट एंड इकोनॉमिक असिस्टेंट स्कीम के तहत फाइनेंस किए गए प्रोजेक्ट के लिए कम से कम 75% सामान और सर्विस भारत से ही मंगाई जानी चाहिए. इससे यह पक्का होता है कि लोन की रकम का एक बड़ा हिस्सा एक्सपोर्ट, इंजीनियरिंग सर्विस और प्रोजेक्ट एग्जीक्यूशन कॉन्ट्रैक्ट के जरिए भारतीय अर्थव्यवस्था में वापस आ जाए.
इसी के साथ भारत और मॉरिशस लोकल करेंसी में बाइलेटरल ट्रेड और लोन रीपेमेंट की दिशा में भी काम कर रहे हैं. इससे यूएस डॉलर पर निर्भरता कम होती है और दोनों देशों के बीच फाइनेंशियल सहयोग मजबूत होता है.
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