Coin Production: रोजमर्रा के लेन-देन में ₹1 का सिक्का सबसे छोटा मूल्य हो सकता है. लेकिन इसको बनाने में इसके अंकित मूल्य से भी ज्यादा लागत आती है. भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा साझा की गई जानकारी के मुताबिक सरकार ₹1 के सिक्के को ढालने के लिए ₹1.11 खर्च करती है. इसका मतलब यह है कि प्रचलन में आने से पहले हर सिक्के पर 11 पैसे का नुकसान होता है. 

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क्यों है इस सिक्के की कीमत उसके मूल्य से ज्यादा?

भारत में सिक्कों का निर्माण सिक्योरिटी प्रिंटिंग एंड मिंटिंग कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड द्वारा मुंबई, कोलकाता, हैदराबाद और नोएडा में स्थित सरकारी टकसालों में किया जाता है. अलग-अलग संप्रदायों के उत्पादन की लागत अलग-अलग होती है. जबकि ₹1 के सिक्के को बनाने में ₹1.11 का खर्च आता है. इस वजह से 11 पैसे का नुकसान होता है. उच्च मूल्य वाले सिक्के सरकार के लिए काफी ज्यादा किफायती हैं.

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सरकारी ₹1 के सिक्के क्यों जारी रखती है? 

घाटे के बावजूद भी सरकार ने ₹1 के सिक्के जारी करना कायम रखा है. ऐसा इसलिए क्योंकि वे कागज के नोटों की तुलना में काफी ज्यादा टिकाऊ होते हैं. ₹1 का नोट आमतौर पर सिर्फ एक से दो साल तक चलता है लेकिन एक स्टेनलेस स्टील का सिक्का 15 से 20 सालों तक चल सकता है. अपने जीवनकाल में सिक्का काफी ज्यादा व्यावहारिक और लागत-प्रभावी विकल्प साबित होता है.

₹1 का सिक्का मूल्य स्थिरता को बनाए रखने में भी बड़ी भूमिका निभाता है. भारत की मुद्रा प्रणाली की सबसे छोटी इकाई के रूप में यह सटीक मूल्य निर्धारण को सक्षम बनाता है. अगर इसे प्रचलन से हटा दिया जाए तो ₹14 या फिर ₹99 जैसी कीमत ₹15 या ₹100  तक हो सकती है. इससे उपभोक्ताओं के लिए संभावित रूप से लागत बढ़ जाएगी.

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सरकार कुल लागत को संतुलित करती है 

हालांकि सरकार को हर एक रुपये के सिक्के पर पैसा खोना पड़ता है लेकिन वह ₹2 या फिर ₹5 और ₹10 के सिक्के बनाकर मार्जिन को कमा लेती है. इस पूरे लाभ को सिग्नियोरेज के रूप में आता है. यह मुद्रा के अंकित मूल्य और उसके उत्पादन की लागत के बीच का अंतर है.

यही वजह है कि जब ₹1 का सिक्का अकेले घाटे में बनता है उच्च मूल्य मूल्यवर्ग से बने मुनाफे की वजह से सिक्का जारी करने की प्रणाली वित्तीय रूप से टिकाऊ बनी रहती है.

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