PM Modi In Melbourne: ऑस्ट्रेलिया दौरे के दौरान मेलबर्न में भारतीय समुदाय को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अंतरिक्ष क्षेत्र में भारत की बढ़ती उपलब्धियों पर भी रोशनी डाली. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने चंद्रयान 3, गगनयान मिशन और भारत के खुद के अंतरिक्ष स्टेशन की महत्वाकांक्षी योजनाओं का जिक्र किया. इसी बीच आइए जानते हैं कि कब तक बनकर तैयार होगा भारत का स्पेस स्टेशन.
भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन का लक्ष्य
भारत का पहला अंतरिक्ष स्टेशन जिसका नाम भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन है 2035 तक पूरी तरह से चालू होने वाला है. इसरो ने स्टेशन को कई चरणों में विकसित करने की योजना बनाई है. इसके पहले मॉड्यूल, बीएएस-01 के लॉन्च के साथ इस स्पेस स्टेशन का सफर शुरू हो जाएगा. यह लॉन्च 2028 में होने की उम्मीद है. एक बार पूरा होने पर स्टेशन में पांच इंटरकनेक्टेड मॉड्यूल शामिल होंगे. ये भारत के दीर्घकालिक मानव अंतरिक्ष उड़ान कार्यक्रम का समर्थन करेंगे. अंतरिक्ष स्टेशन से भविष्य के मिशनों में भी बड़ी भूमिका निभाने की उम्मीद है. इसमें गगनयान और 2040 तक चंद्रमा पर एक अंतरिक्ष यात्री को उतारने का भारत का लक्ष्य शामिल है.
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इसरो ने कई बड़े कदम उठा लिए हैं
इसरो ने पहले ही भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन के डिजाइन और कॉन्फिगरेशन को अंतिम रूप दे दिया है. साथ ही परियोजना को राष्ट्रीय स्तर की समीक्षा समिति से मंजूरी मिल चुकी है. अंतरिक्ष एजेंसी ने भारत मंडपम में आयोजित एक प्रदर्शनी में BAS-01 मॉड्यूल का एक मॉडल भी प्रदर्शित किया है. इसकी लंबाई 3.8 मीटर×8 मीटर है. इसी के साथ भारत सरकार ने पहले मॉड्यूल को विकसित करने के लिए प्रारंभिक बजट को मंजूरी दे दी है और इसरो ने इसके निर्माण में भाग लेने के लिए घरेलू एयरोस्पेस कंपनी को आमंत्रित करके मैन्युफैक्चरिंग की प्रक्रिया शुरू कर दी है.
डॉकिंग टेक्नोलॉजी का परीक्षण चल रहा है
अंतरिक्ष स्टेशन को असेंबल करने के लिए सबसे जरूरी टेक्नोलॉजी में से एक स्पेस डॉकिंग है. यह पृथ्वी की परिक्रमा करते समय अलग-अलग मॉड्यूल को कनेक्ट करने में सक्षम बनाता है. इस क्षमता में महारत हासिल करने के लिए इसरो ने स्पेस डॉकिंग एक्सपेरिमेंट कार्यक्रम लॉन्च किया है. इससे यह डॉकिंग परीक्षण कर रहा है और भविष्य के स्टेशन असेंबली के लिए जरूरी तकनीक को मान्य कर रहा है.
कैसा दिखेगा भारत का अंतरिक्ष स्टेशन?
भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन का वजन लगभग 52 टन होगा और यह लगभग 400 किलोमीटर की ऊंचाई पर लो अर्थ आर्बिट में संचालित होगा. शुरुआत में यह एक कॉम्पैक्ट लेकिन पूरी तरह से आजाद अनुसंधान प्रयोगशाला के रूप में काम करेगा. यहां भारतीय अंतरिक्ष यात्री एक समय में 15 से 20 दिनों तक रह सकते हैं.
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