लोकसभा में धन्यवाद प्रस्ताव पर बहस पूरी हो चुकी है, लेकिन एक सवाल अब भी है. जिस जवाब का इंतजार पूरे सदन को था, वह आया ही नहीं. तय समय, तय तारीख और तय उम्मीदों के बावजूद प्रधानमंत्री का संबोधन नहीं हो सका और आखिरकार धन्यवाद प्रस्ताव पारित भी हो गया. ऐसे में अब बहस इस बात पर है कि क्या संसद प्रधानमंत्री के जवाब के बिना भी पूरी मानी जा सकती है? आइए समझें. 

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धन्यवाद प्रस्ताव बिना पीएम जवाब के कैसे पारित हुआ?

लोकसभा में राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव पर चर्चा का जवाब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को देना था. इसके लिए 4 फरवरी को शाम 5 बजे का समय भी तय किया गया था, लेकिन उस दिन विपक्ष के जोरदार हंगामे के कारण सदन की कार्यवाही बार-बार बाधित हुई और अंत में पूरे दिन के लिए स्थगित कर दी गई. इसके बाद माना जा रहा था कि प्रधानमंत्री गुरुवार यानि आज लोकसभा में इस चर्चा का जवाब देंगे, लेकिन ऐसा नहीं हुआ. आखिरकार धन्यवाद प्रस्ताव प्रधानमंत्री के संबोधन के बिना ही लोकसभा से पारित हो गया. 

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राष्ट्रपति का अभिभाषण क्यों होता है अहम?

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 87 के तहत हर साल संसद के बजट सत्र की शुरुआत राष्ट्रपति के अभिभाषण से होती है. यह अभिभाषण औपचारिक जरूर लगता है, लेकिन असल में यह सरकार की नीतियों, योजनाओं और आने वाले एजेंडे का आधिकारिक दस्तावेज होता है. राष्ट्रपति इसे पढ़ते हैं, लेकिन इसकी जिम्मेदारी सरकार की होती है. इसी अभिभाषण पर संसद में धन्यवाद प्रस्ताव लाया जाता है और उस पर चर्चा होती है. 

धन्यवाद प्रस्ताव की चर्चा का मतलब क्या है?

धन्यवाद प्रस्ताव पर होने वाली बहस में सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों सरकार की नीतियों पर अपनी बात रखते हैं. विपक्ष सवाल उठाता है, आलोचना करता है और सरकार से जवाब मांगता है. यह बहस सरकार की जवाबदेही तय करने का एक अहम मंच मानी जाती है. इसी वजह से इस चर्चा के अंत में प्रधानमंत्री का जवाब राजनीतिक और संसदीय दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है.

क्या प्रधानमंत्री का जवाब संवैधानिक रूप से जरूरी है?

संविधान की नजर से देखें तो प्रधानमंत्री का संबोधन अनिवार्य नहीं है. कहीं भी यह नहीं लिखा है कि धन्यवाद प्रस्ताव पर बहस के बाद प्रधानमंत्री को ही जवाब देना होगा. संसद की कार्यवाही राष्ट्रपति के अभिभाषण, धन्यवाद प्रस्ताव और उस पर वोटिंग के साथ पूरी मानी जाती है. अगर प्रधानमंत्री किसी कारण से जवाब नहीं देते हैं, तो भी धन्यवाद प्रस्ताव पारित किया जा सकता है, जैसा कि इस बार हुआ.

फिर पीएम के जवाब को लेकर इतना जोर क्यों?

यह सवाल कानून से ज्यादा परंपरा और राजनीति से जुड़ा है. अब तक की संसदीय परंपरा में आमतौर पर प्रधानमंत्री ही धन्यवाद प्रस्ताव पर बहस का अंतिम जवाब देते रहे हैं. इसे सरकार का सबसे आधिकारिक और निर्णायक पक्ष माना जाता है. प्रधानमंत्री का जवाब न आना विपक्ष के लिए यह कहने का मौका बन जाता है कि सरकार बहस से बच रही है.

क्या संसद पीएम के बिना नहीं चल सकती?

इसका सीधा जवाब है- संसद चल सकती है. संसद का काम संविधान और नियमों से चलता है, न कि परंपराओं से. प्रधानमंत्री का जवाब संसद को वैध बनाने के लिए जरूरी नहीं है. हां, राजनीतिक और लोकतांत्रिक दृष्टि से इसे महत्वपूर्ण जरूर माना जाता है, क्योंकि इससे सरकार की जवाबदेही मजबूत होती है.

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