हर साल सर्दियों में दिल्ली-एनसीआर की हवा जहरीली हो जाती है, और इसके लिए वाहनों के धुएं के साथ-साथ इंडस्ट्रियल पॉल्यूशन को भी बड़ी वजह माना जाता है. इंस्पेक्शन, पेनल्टी और फैक्ट्री बंद करने जैसे पुराने तरीके बार-बार इस्तेमाल होने के बावजूद दिल्ली की हवा में खास सुधार नहीं दिख पाया है. 

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ऐसे में गुजरात का एक मॉडल पूरे देश और दुनिया का ध्यान खींच रहा है, जिसने इंडस्ट्रियल पॉल्यूशन को कंट्रोल करने के लिए पारंपरिक तरीकों से हटकर बिल्कुल अलग रास्ता अपनाया है. हाल ही में ब्राजील के रियो डी जेनेरियो ने भी गुजरात के इस मॉडल को अपनाने में दिलचस्पी दिखाई है, जिसके बाद यह सवाल और गहरा हो गया है कि क्या दिल्ली भी इससे कुछ सीख सकती है.

रियल टाइम मॉनिटरिंग बनी गुजरात मॉडल की नींव

गुजरात प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने बड़ी फैक्ट्रियों के लिए कंटीन्यूअस एमिशन मॉनिटरिंग सिस्टम यानी सीईएमएस लगाना अनिवार्य किया, जिससे फैक्ट्रियों से निकलने वाले प्रदूषण की रियल टाइम में लगातार निगरानी हो सके. पुराने तरीके में साल में कुछ बार मैनुअल सैंपल लेकर जांच की जाती थी, जिससे असली तस्वीर सामने नहीं आ पाती थी. सीईएमएस की मदद से अब अधिकारी हर पल यह देख सकते हैं कि कौन सी फैक्ट्री तय सीमा से ज्यादा प्रदूषण फैला रही है, जिससे गड़बड़ी करने वालों को पकड़ना आसान हो गया.

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इमिशन ट्रेडिंग स्कीम से मिला कमाल का नतीजा

गुजरात ने सूरत जैसे इंडस्ट्रियल क्लस्टर में इमिशन ट्रेडिंग स्कीम भी शुरू की, जो देश और दुनिया के लिए एक अनूठा प्रयोग माना जाता है. इस स्कीम के तहत पूरे इंडस्ट्रियल इलाके के लिए प्रदूषण की एक अधिकतम सीमा तय की जाती है और उसे परमिट में बांट दिया जाता है. जो फैक्ट्री अपने तय लक्ष्य से ज्यादा प्रदूषण कम कर लेती है, वह अपने बचे हुए परमिट दूसरी फैक्ट्री को बेच सकती है, जिसके लिए प्रदूषण कम करना महंगा या मुश्किल होता है. इससे कुल प्रदूषण की सीमा तो बनी रहती है, लेकिन हर फैक्ट्री को अपने हिसाब से रास्ता चुनने की आजादी भी मिल जाती है.

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इंस्पेक्शन के बजाय डेटा पर भरोसा

गुजरात मॉडल की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह सिर्फ निरीक्षण और सजा पर निर्भर नहीं है, बल्कि भरोसेमंद डेटा और मार्केट के तरीकों का इस्तेमाल करता है. इससे रेगुलेटर और इंडस्ट्री के बीच टकराव कम होता है, और फैक्ट्री मालिकों को भी यह समझ आता है कि प्रदूषण कम करना उनके लिए फायदे का सौदा भी बन सकता है. गुजरात में उद्योगपतियों और अधिकारियों के बीच अपेक्षाकृत सहयोग वाला माहौल भी इस मॉडल की कामयाबी की एक बड़ी वजह मानी जाती है.

दिल्ली के लिए क्या है सीख?

दिल्ली-एनसीआर में सर्दियों में बार-बार लगने वाली पाबंदियां और इंस्पेक्शन का पुराना सिस्टम अब तक हवा की गुणवत्ता को ठीक करने में पूरी तरह कामयाब नहीं हो पाया है. एक्सपर्ट्स का मानना है कि दिल्ली भी बड़े इंडस्ट्रियल क्लस्टर में सीईएमएस जैसी रियल टाइम मॉनिटरिंग तकनीक और गुजरात जैसी इमिशन ट्रेडिंग स्कीम को अपनाकर बेहतर नतीजे हासिल कर सकती है. सिर्फ फैक्ट्रियां बंद करने और जुर्माना लगाने के बजाय, अगर उद्योगों को प्रदूषण कम करने के लिए मार्केट आधारित मौका दिया जाए, तो लंबे समय में इसका असर ज्यादा टिकाऊ हो सकता है. हालांकि इसके लिए मजबूत तकनीकी ढांचा, सही डेटा और रेगुलेटर व इंडस्ट्री के बीच बेहतर तालमेल बनाना भी उतना ही जरूरी होगा.

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