Official Language Of Countries: भाषा सिर्फ कम्युनिकेशन का ही जरिया नहीं होती. बल्कि यह गवर्नेंस, पहचान और एकता से काफी ज्यादा गहराई से जुड़ी हुई है. किसी भी देश के द्वारा अपनी ऑफिशियल भाषा को तय करना संवैधानिक बहस, राजनीतिक समझौते और डेमोग्राफिक सच्चाई का नतीजा होता है. आइए जानते हैं की कोई भी देश अपनी ऑफिशियल भाषा कैसे तय करता है.
ऑफिशियल भाषाओं की संवैधानिक नींव
ज्यादातर देशों में संविधान ऑफिशियल भाषा तय करने में बड़ी भूमिका निभाता है. आजादी या फिर राजनीतिक पुनर्गठन के बाद संविधान सभाएं इस बात पर बहस करती हैं कि सरकारी काम, अदालत और कानून बनाने के लिए किस भाषा का इस्तेमाल किया जाएगा. भारत में संविधान का अनुच्छेद 343 हिंदी को ऑफिशियल भाषा का दर्जा देता है. इसी के साथ कानून के तहत ऑफीशियली कामों के लिए अंग्रेजी को जारी रखने की अनुमति देता है.
ऐतिहासिक और राजनीतिक प्रभाव
इतिहास अक्सर भाषा की नीति को आकार देता है. अफ्रीका और एशिया के कई देशों ने आजादी के बाद भी अंग्रेजी या फिर फ्रेंच को ऑफिशियल भाषा के रूप में बनाए रखा. ऐसा प्रशासनिक निरंतरता को सुनिश्चित करने और आंतरिक भाषाई परेशानियों से बचने के लिए किया गया था.
जनसांख्यिकी और बहुसंख्यक भाषा की भूमिका
आबादी के सबसे बड़े हिस्से द्वारा बोली या फिर समझे जाने वाली भाषा को अक्सर ऑफिशियल भाषा बना दिया जाता है. लेकिन भाषाई रूप से विविध देशों में यह तरीका परेशानी भरा हो सकता है. एक भाषा थोपने के बजाय सरकार क्षेत्रीय पहचान और सामाजिक सद्भाव का सम्मान करने के लिए कई ऑफिशियल भाषाओं को मान्यता दे सकती है.
क्या होती है कानूनी प्रक्रिया
ऑफिशियल भाषा का दर्जा हमेशा के लिए तय नहीं होता. सरकार राष्ट्रीय जरूरत के हिसाब से भाषाओं को जोड़ने या बदलने के लिए कानून या संवैधानिक संशोधन कर सकती हैं. भारत में यह आठवीं अनुसूची में दिखता है जो आज के समय में 22 भाषाओं को मान्यता देती है.
एक बार जब कोई भाषा चुन ली जाती है तो उसे ऑफिशियल इस्तेमाल के लिए मानकीकृत किया जाना चाहिए. इसमें व्याकरण के नियम, शब्दकोश और तकनीकी शब्दावली को विकसित करना शामिल है. कई देश आधिकारिक तौर पर कई भाषाओं को मान्यता देते हैं. जैसे स्विट्जरलैंड, कनाडा और बेल्जियम भाषाई समानता की रक्षा करने के लिए एक से ज्यादा भाषाओं को सामान आधिकारिक दर्जा देते हैं.
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