Doomsday Clock: दुनिया शायद पहले से कहीं ज्यादा तेज एक वैश्विक तबाही के करीब है. कम से कम बुलेटिन ऑफ द एटॉमिक साइंटिस्ट्स के वैज्ञानिकों द्वारा रखी जाने वाली मशहूर डूम्सडे क्लॉक के मुताबिक तो यही लगता है. जनवरी में इस संस्था ने इस प्रतीकात्मक घड़ी की सुइयों को चार सेकंड और आगे बढ़ा दिया है. इससे इंसानियत आधी रात से सिर्फ 85 सेकंड दूर रह गई है. यह वह बिंदु है जो वैश्विक प्रलय या फिर सभ्यता को खत्म करने वाली आपदा को दर्शाता है. वैज्ञानिक इसे 1947 में घड़ी के पहली बार बनने के बाद से अब तक का सबसे खतरनाक पल बता रहे हैं.

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डूम्सडे क्लॉक क्या है? 

डूम्सडे क्लॉक असल में समय बताने वाली कोई घड़ी नहीं है बल्कि यह एक प्रतीकात्मक चेतावनी प्रणाली है. इसे दूसरे विश्व युद्ध के बाद उन वैज्ञानिकों ने बनाया था जो परमाणु हथियारों और वैश्विक सुरक्षा खतरों को लेकर चिंतित थे. यह घड़ी समय के आधी रात के करीब पहुंचने के रूपक का इस्तेमाल करके इस बात को दर्शाती है कि इंसानियत खुद को खत्म करने की तरफ बढ़ रही है. वैज्ञानिकों का मानना है की घड़ी की सुइयां आधी रात के जितने करीब पहुंचती हैं दुनिया पर परमाणु युद्ध, पर्यावरण के विनाश या फिर तकनीकी आपदा जैसी विनाशकारी घटनाओं का खतरा उतना ही ज्यादा बढ़ जाता है.

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दुनिया अब पहले से कहीं ज्यादा करीब 

जब 1947 में पहली बार इस घड़ी को पेश किया गया था तब इसे आधी रात से 7 मिनट पहले पर सेट किया गया था. इसके इतिहास का सबसे सुरक्षित दौर 1991 में आया. उस वक्त अमेरिका और सोवियत संघ के बीच शीत युद्ध खत्म हो गया था. उस समय परमाणु तनाव कम होने की वजह से वैज्ञानिकों ने घड़ी को पीछे करके आधी रात से 17 मिनट पहले पर सेट कर दिया था.

हालांकि बीते कुछ सालों में स्थिति लगातार बिगड़ती गई है. 2023 में घड़ी आधी रात से 90 सेकंड पहले पर थी. 2025 में यह 89 सेकंड पर पहुंच गई और अब वैज्ञानिकों ने इसे फिर से आगे बढ़कर आधी रात से सिर्फ 85 सेकंड पहले पर सेट कर दिया है. 

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वैज्ञानिकों ने घड़ी को आगे क्यों बढ़ाया? 

बुलेटिन ऑफ द एटॉमिक साइंटिस्ट्स के मुताबिक कई आपस में जुड़े हुए वैश्विक संकटों की वजह से उन्होंने घड़ी को आधी रात के और करीब सेट कर दिया है.  सबसे बड़ी चिंताओं में से एक रूस, चीन और अमेरिका जैसी बड़ी ताकतों के बीच बढ़ती परमाणु हथियारों की होड़ है.

युद्ध और वैश्विक संघर्ष बढ़ा रहे हैं जोखिम  

चल रहे अंतर्राष्ट्रीय संघर्षों ने भी इस घड़ी को आगे बढ़ाने में एक बड़ी भूमिका निभाई है. विशेषज्ञों का ऐसा मानना है कि यह संघर्ष परमाणु शक्तियों से जुड़े सैन्य टकराव की जोखिमों को और बढ़ते हैं. 

इतिहास में पहली बार वैज्ञानिक आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस को भी वैश्विक  जोखिम में एक बड़ा योगदानकर्ता के रूप में दिख रहे हैं. तेजी से विकसित हो रहे आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस सिस्टम गलत सूचना, साइबर युद्ध, स्वायत्त हथियारों और सैन्य संघर्षों के दौरान फैसला लेने में होने वाली गलतियों के बारे में चिंता पैदा कर रहे हैं.

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