Youth Jobs: भारत में बेरोजगारी की समस्या मुख्य रूप से युवाओं की बेरोजगारी की समस्या बनती जा रही है. मिलेनियल्स ने वर्कफोर्स में काफी हद तक अपनी जगह बना ली है, वहीं Gen Z को अच्छी शिक्षा होने के बावजूद स्थिर नौकरी पाने में काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है. अजीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी और इंटरनेशनल लेबर ऑर्गेनाइजेशन जैसे संस्थानों की रिपोर्ट से यह पता चलता है कि भारत के वर्कफोर्स का सबसे युवा वर्ग शैक्षिक योग्यता और बाजार की जरूरत के बीच बढ़ते अंतर से जूझ रहा है.

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Gen Z में बेरोजगारी सबसे ज्यादा 

लेबर मार्केट डेटा के मुताबिक 15 से 24 साल के युवाओं में बेरोजगारी की दर सबसे ज्यादा है. इस आयु वर्ग में बेरोजगारी की दर लगभग 40% बताई जाती है. इससे यह देश की सबसे ज्यादा प्रभावित पीढ़ी बन गई है. इस श्रेणी के ज्यादातर लोग या तो अपनी पढ़ाई पूरी कर रहे हैं, पहली बार लेबर मार्केट में कदम रख रहे हैं या फिर अपनी पहली फुल टाइम नौकरी की तलाश कर रहे हैं. इसके उलट जैसे-जैसे लोगों की उम्र बढ़ती है और उन्हें काम का अनुभव मिलता है बेरोजगारी धीरे-धीरे कम होती जाती है. 

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मिलेनियल्स बेहतर स्थिति में 

डेटा से यह पता चलता है कि 25 से 29 साल के युवा मिलेनियल्स में बेरोजगारी की दर लगभग 20% है. यह Gen Z की तुलना में काफी कम है. 30 से 40 साल के सीनियर मिलेनियल्स में बेरोजगारी का स्तर काफी कम है क्योंकि इनमें से ज्यादातर लोगों को पहले ही नौकरी मिल चुकी है, उन्होंने प्रोफेशनल नेटवर्क बना लिए हैं या फिर पिछले कुछ सालों में अपना करियर सेट कर लिया है.

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बेरोजगारों में युवाओं का बड़ा हिस्सा 

चौंकाने वाली बातों में से एक यह है कि देश की कुल बेरोजगार आबादी में युवाओं की हिस्सेदारी लगभग 83 प्रतिशत है. इसका मतलब यह है कि नौकरी पाने के लिए संघर्ष कर रहे लोगों में से ज्यादातर युवा आयु वर्ग के हैं. हर साल लाखों छात्रों के ग्रेजुएट होने की वजह से अच्छी नौकरियों के लिए कंपटीशन लगातार बढ़ता जा रहा है. 

शिक्षित बेरोजगारी का संकट 

भारत की बेरोजगारी की कहानी का सबसे अनोखा पहलू यह है कि उच्च शिक्षा हमेशा नौकरी की गारंटी नहीं देती. रिपोर्ट के मुताबिक ग्रेजुएट युवाओं में बेरोजगारी की दर लगभग 29.1% है. इसी के साथ कम पढ़े लिखे या फिर बिना शिक्षा वाले लोगों में बेरोजगारी सिर्फ 3.4% है. 

भारत में हर साल लगभग 50 लाख ग्रेजुएट निकलते हैं लेकिन इनमें से सिर्फ 28 लाख को ही नौकरी मिल पाती है. एजुकेशन के इंस्टिट्यूट और इंडस्ट्री की जरूरत के बीच स्किल का अंतर काफी बढ़ रहा है. हालांकि छात्र डिग्री तो हासिल कर लेते हैं लेकिन उनमें से कई में प्रैक्टिकल, डिजिटल, टेक्निकल या फिर कम्युनिकेशन स्किल्स की कमी होती है.

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