Jharkhand Cross Voting: झारखंड में राज्यसभा चुनाव के बाद क्रॉस वोटिंग के आरोपों ने  INDIA गठबंधन के अंदर एक नया राजनीतिक विवाद खड़ा कर दिया है. दरअसल कांग्रेस ने अपने सहयोगी दलों, राष्ट्रीय जनता दल और CPI (ML) पर गठबंधन के बाहर उम्मीदवारों का समर्थन करने का आरोप लगाया है. ऐसा इसलिए क्योंकि कांग्रेस उम्मीदवार प्रणव झा को हार का सामना करना पड़ा था. हालांकि दोनों पार्टियों ने इन आरोपों को खारिज कर दिया है लेकिन इस घटना ने एक बार फिर से क्रॉस वोटिंग की अवधारणा की तरफ सभी का ध्यान खींचा है.  आइए जानते हैं कि कैसे होती है क्रॉस वोटिंग और कैसे लगाया जाता है इसका पता.

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क्रॉस वोटिंग क्या है? 

क्रॉस वोटिंग तब होती है जब कोई विधायक या फिर सांसद अपनी राजनीतिक पार्टी द्वारा आधिकारिक तौर पर समर्थित उम्मीदवार के बजाय किसी दूसरे उम्मीदवार को वोट देता है. आसान शब्दों में कहें तो जब कोई विधायक पार्टी के निर्देशों के बावजूद विपक्षी पार्टी के उम्मीदवार या फिर निर्दलीय उम्मीदवार का समर्थन करने का फैसला करता है तो उसे क्रॉस वोटिंग कहते हैं. 

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क्रॉस वोटिंग कैसे होती है? 

राजनीतिक पार्टियां आमतौर पर अपने विधायकों को किसी खास उम्मीदवार को वोट देने का निर्देश देती हैं. हालांकि कुछ विधायक इन निर्देशों को नजरअंदाज कर किसी दूसरे उम्मीदवार के पक्ष में वोट देने का फैसला करते हैं. इस तरह की वोटिंग पार्टी के अंदरूनी मतभेद, लीडरशिप से असंतोष, राजनीतिक सौदेबाजी, व्यक्तिगत संबंध या फिर रणनीतिक गणनाओं की वजह हो सकती है. क्योंकि चुनावों में हर वोट का काफी महत्व होता है इस वजह से क्रॉस वोटिंग पूरे परिणाम बदल सकती है.

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पार्टी व्हिप इसे क्यों नहीं रोकती?

क्रॉस वोटिंग होने के पीछे सबसे बड़ी वजह यह है कि दल बदल विरोधी कानून राज्यसभा चुनावों पर अपने आप लागू नहीं होता. सुप्रीम कोर्ट ने 2006 के कुलदीप नैयर फैसले में यह व्यवस्था दी थी कि राज्यसभा चुनाव चुनावी प्रक्रिया है ना कि सदन की विधायी कार्यवाही. इस वजह से विधानसभा या फिर संसद में वोटिंग के दौरान लागू होने वाला कानूनी पार्टी व्हिप इन चुनावों में वैसा असर नहीं डालता है.

क्रॉस वोटिंग का पता कैसे लगाया जाता है? 

राज्यसभा और विधान परिषद चुनाव में क्रॉस वोटिंग की पहचान करना आमतौर पर आसान होता है. ऐसा इसलिए क्योंकि 2003 में ओपन बैलेट सिस्टम शुरू किया गया था. इस प्रणाली के तहत राजनीतिक दलों से जुड़े विधायकों को बैलट बॉक्स में अपना मत पत्र डालने से पहले उसे अधिकृत पार्टी एजेंट को दिखाना होता है. इससे पार्टी यह पता लगा सकती है कि विधायक ने आधिकारिक निर्देशों के मुताबिक वोट दिया है या फिर नहीं. जैसे ही बैलेट दिखाया जाता है पार्टी के रिप्रेजेंटेटिव देख सकते हैं कि विधायक ने पार्टी उम्मीदवार का समर्थन किया है या फिर किसी और का. 

अगर किसी पार्टी से जुड़ा विधायक अधिकृत पार्टी एजेंट को बैलेट पेपर दिखाने से मन करता है तो चुनाव अधिकारी वोट को अमान्य घोषित कर देते हैं.

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